राजनीति

शांतिपूर्ण और प्रगतिशील विश्व के निर्माण में भारत की हो सकती है महत्वपूर्ण भूमिका

आज का विश्व एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ विज्ञान और तकनीक ने अभूतपूर्व प्रगति तो दी है, लेकिन साथ ही युद्ध, आतंकवाद, जलवायु संकट, आर्थिक असमानता और वैचारिक टकराव जैसी चुनौतियाँ भी अत्यंत गंभीर रूप ले चुकी हैं। एक ओर कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष अनुसंधान और डिजिटल क्रांति मानव जीवन को नई दिशा दे रहे हैं, वहीं दूसरी ओर अनेक देशों में युद्ध और अस्थिरता मानवता के भविष्य पर प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं। ऐसे समय में विश्व को केवल शक्तिशाली देशों की नहीं, बल्कि ऐसे नेतृत्व की आवश्यकता है जो शांति, संतुलन, सहयोग और मानवता के मूल्यों को केंद्र में रखकर आगे बढ़ सके। भारत इस भूमिका के लिए स्वाभाविक रूप से उपयुक्त दिखाई देता है।
भारत केवल एक देश नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से विकसित होती आई एक ऐसी सभ्यता है जिसने दुनिया को “वसुधैव कुटुम्बकम्” का संदेश दिया। यह विचार कि पूरी पृथ्वी एक परिवार है, आज के विभाजित और तनावग्रस्त विश्व में पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है। भारत की सांस्कृतिक चेतना सदैव संवाद, सहअस्तित्व और शांति पर आधारित रही है। यही कारण है कि भारत का वैश्विक दृष्टिकोण विस्तारवादी नहीं बल्कि सहयोगवादी रहा है।
आज जब विश्व के अनेक शक्तिशाली राष्ट्र अपने-अपने गुटों में बँटते जा रहे हैं, भारत ने संतुलित कूटनीति का मार्ग अपनाया है। भारत ने पश्चिमी देशों, रूस, पश्चिम एशिया, अफ्रीका और एशियाई देशों के साथ समान रूप से संवाद बनाए रखा है। यही कारण है कि आज भारत को एक विश्वसनीय मध्यस्थ और संतुलनकारी शक्ति के रूप में देखा जा रहा है। हाल के वर्षों में भारत ने ग्लोबल साउथ अर्थात विकासशील देशों की आवाज़ को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रमुखता से उठाया है।
भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी लोकतांत्रिक व्यवस्था है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में भारत ने यह सिद्ध किया है कि विविधताओं से भरे समाज में भी लोकतांत्रिक मूल्यों को जीवित रखा जा सकता है। अनेक भाषाएँ, धर्म, संस्कृतियाँ और जीवनशैलियाँ होने के बावजूद भारत का लोकतांत्रिक ढाँचा निरंतर आगे बढ़ रहा है। यह अनुभव विश्व के उन देशों के लिए प्रेरणा बन सकता है जो सामाजिक संघर्षों और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहे हैं।
विश्व शांति के निर्माण में भारत की भूमिका केवल विचारों तक सीमित नहीं रही है। संयुक्त राष्ट्र की शांति सेनाओं में भारत लंबे समय से महत्वपूर्ण योगदान देता रहा है। भारत के सैनिक अनेक देशों में शांति स्थापना अभियानों का हिस्सा रहे हैं। भारत ने हमेशा यह प्रयास किया है कि विवादों का समाधान युद्ध से नहीं बल्कि संवाद और कूटनीति से निकले। यूक्रेन संकट से लेकर पश्चिम एशिया की जटिल परिस्थितियों तक भारत ने बार-बार बातचीत और शांतिपूर्ण समाधान की आवश्यकता पर बल दिया है।
आज विश्व बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। अब केवल एक या दो देशों का प्रभुत्व वैश्विक राजनीति को नियंत्रित नहीं कर सकता। इस बदलती विश्व व्यवस्था में भारत एक ऐसे देश के रूप में उभर रहा है जो विभिन्न शक्तियों के बीच संतुलन बना सकता है। समकालीन भारत की सक्रिय कूटनीतिक गतिविधियाँ — यूरोपीय देशों के साथ उच्चस्तरीय संवाद, ब्रिक्स और क्वाड से जुड़े कार्यक्रम तथा वैश्विक नेताओं के साथ लगातार संपर्क — यह संकेत देते हैं कि भारत विश्व राजनीति के केंद्र में अपनी उपस्थिति मजबूत कर रहा है।
भारत की भूमिका केवल राजनीतिक या कूटनीतिक नहीं है; आर्थिक दृष्टि से भी भारत विश्व के लिए महत्वपूर्ण बनता जा रहा है। विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल भारत आज विनिर्माण, सेवा क्षेत्र, डिजिटल तकनीक और नवाचार के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है। यदि भारत अपनी आर्थिक शक्ति को मानव-केंद्रित विकास मॉडल से जोड़ता है, तो वह विश्व को एक ऐसा विकल्प दे सकता है जिसमें विकास और सामाजिक न्याय दोनों साथ चलें।
विशेष रूप से डिजिटल क्षेत्र में भारत का अनुभव उल्लेखनीय है। डिजिटल भुगतान, सार्वजनिक डिजिटल ढाँचा, दूरस्थ शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में भारत ने ऐसे मॉडल विकसित किए हैं जिन्हें विकासशील देशों में लागू किया जा सकता है। अफ्रीका और एशिया के अनेक देशों के लिए भारत तकनीकी सहयोग का विश्वसनीय साझेदार बन सकता है। भारत की यह क्षमता विश्व के गरीब और विकासशील देशों को आत्मनिर्भर बनाने में सहायक हो सकती है।
जलवायु परिवर्तन के संकट में भी भारत की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो सकती है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन जैसी पहलों के माध्यम से स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने का प्रयास किया है। भारत का दृष्टिकोण यह रहा है कि पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन बनाया जाए। हाल के वर्षों में भारत की जलवायु कूटनीति को वैश्विक स्तर पर गंभीरता से देखा जा रहा है।
आज विश्व के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या विकास केवल आर्थिक लाभ तक सीमित रहेगा या वह मानवता के कल्याण को भी प्राथमिकता देगा। भारत इस प्रश्न का उत्तर अपनी सांस्कृतिक दृष्टि से दे सकता है। भारतीय चिंतन सदैव प्रकृति और मनुष्य के बीच संतुलन की बात करता रहा है। यदि भारत अपनी नीतियों में सतत विकास, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक न्याय को मजबूती से लागू करता है, तो वह दुनिया के लिए एक प्रेरक मॉडल बन सकता है।
भारत की युवा शक्ति भी विश्व निर्माण में उसकी सबसे बड़ी पूँजी है। आज भारत दुनिया की सबसे युवा आबादी वाले देशों में से एक है। यदि यह युवा वर्ग शिक्षा, नवाचार, विज्ञान और सामाजिक चेतना से जुड़ता है, तो भारत न केवल अपनी दिशा बदलेगा बल्कि विश्व को भी नई ऊर्जा देगा। भारतीय युवा आज विज्ञान, तकनीक, चिकित्सा, साहित्य और उद्यमिता के क्षेत्र में वैश्विक पहचान बना रहे हैं।
शिक्षा और ज्ञान के क्षेत्र में भारत की ऐतिहासिक विरासत भी महत्वपूर्ण है। नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालयों ने कभी विश्व को ज्ञान दिया था। आज आवश्यकता है कि भारत आधुनिक शिक्षा और प्राचीन ज्ञान के समन्वय से ऐसा बौद्धिक वातावरण बनाए जो विश्व को नई दिशा दे सके। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष विज्ञान, जैव-प्रौद्योगिकी और पर्यावरण विज्ञान जैसे क्षेत्रों में भारत यदि नैतिक दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ता है, तो वह मानवता के लिए उपयोगी तकनीकी विकास का नेतृत्व कर सकता है।
भारत की सांस्कृतिक शक्ति भी विश्व में उसकी पहचान को मजबूत करती है। योग, आयुर्वेद, भारतीय दर्शन, संगीत और अध्यात्म आज विश्व के अनेक देशों में सम्मान के साथ स्वीकार किए जा रहे हैं। यह केवल सांस्कृतिक प्रभाव नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक संतुलन की खोज कर रही दुनिया के लिए एक वैकल्पिक दृष्टि है। आधुनिक जीवन की भागदौड़ और मानसिक तनाव से जूझते विश्व को भारत की आध्यात्मिक परंपरा नई आशा दे सकती है।
विश्व में बढ़ते संघर्षों के बीच भारत का “संवाद आधारित समाधान” का दृष्टिकोण अत्यंत महत्वपूर्ण हो सकता है। आज अनेक देशों में राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ रहा है। ऐसे समय में भारत यदि अपने भीतर सामाजिक सौहार्द, लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक आदर्शों को और मजबूत करता है, तो वह विश्व के सामने एक सकारात्मक उदाहरण बन सकता है।
भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी विशेषता उसकी रणनीतिक स्वायत्तता रही है। भारत ने हमेशा अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए स्वतंत्र निर्णय लेने का प्रयास किया है। यही कारण है कि भारत विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी अलग पहचान बनाए रखने में सफल रहा है। ब्रिक्स, जी-20, क्वाड और अन्य बहुपक्षीय मंचों पर भारत की सक्रिय भूमिका यह दिखाती है कि वह केवल क्षेत्रीय शक्ति नहीं बल्कि वैश्विक नीति-निर्माण में प्रभावशाली भागीदारी चाहता है।
हाल के वर्षों में हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की सक्रियता भी बढ़ी है। समुद्री सुरक्षा, व्यापार मार्गों की रक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए भारत ने महत्वपूर्ण पहल की है। भारत ने यह स्पष्ट किया है कि वैश्विक व्यापार और नौवहन की स्वतंत्रता विश्व शांति और आर्थिक स्थिरता के लिए आवश्यक है।
विश्व में बढ़ती असमानता भी एक बड़ी चुनौती है। कुछ देशों के पास अत्यधिक संसाधन हैं जबकि अनेक देश गरीबी, भुखमरी और कर्ज संकट से जूझ रहे हैं। भारत ने बार-बार यह प्रयास किया है कि विकासशील देशों की समस्याओं को वैश्विक मंचों पर गंभीरता से उठाया जाए। जी-20 में अफ्रीकी संघ को शामिल कराने में भारत की भूमिका इसी सोच को दर्शाती है।
भारत यदि वास्तव में विश्व के शांतिपूर्ण और प्रगतिशील भविष्य में बड़ी भूमिका निभाना चाहता है, तो उसे अपने भीतर भी कई चुनौतियों का समाधान करना होगा। गरीबी, बेरोजगारी, सामाजिक असमानता, प्रदूषण और शिक्षा की समस्याओं को दूर किए बिना कोई भी राष्ट्र विश्व नेतृत्व की भूमिका को स्थायी रूप से नहीं निभा सकता। इसलिए भारत की वैश्विक भूमिका का आधार उसका आंतरिक सशक्तिकरण ही होगा।
भारत को विज्ञान और अनुसंधान में निवेश बढ़ाना होगा। केवल उपभोक्ता अर्थव्यवस्था बनकर कोई राष्ट्र विश्व का मार्गदर्शन नहीं कर सकता। ज्ञान, नवाचार और अनुसंधान ही भविष्य की वास्तविक शक्ति होंगे। यदि भारत विज्ञान और नैतिकता को साथ लेकर आगे बढ़े, तो वह तकनीकी विकास को मानवता के हित में दिशा दे सकता है।
आज संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक संस्थाओं की प्रभावशीलता पर भी प्रश्न उठ रहे हैं। अनेक अंतरराष्ट्रीय संकटों में इन संस्थाओं की सीमाएँ सामने आई हैं। ऐसे समय में भारत जैसे देशों की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है जो बहुपक्षवाद, अंतरराष्ट्रीय कानून और संतुलित संवाद का समर्थन करते हैं। हाल की घटनाओं ने यह स्पष्ट किया है कि विश्व व्यवस्था को अधिक न्यायपूर्ण और प्रतिनिधिक बनाने की आवश्यकता है।
भारत की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसने अपनी प्रगति को केवल सैन्य शक्ति तक सीमित नहीं रखा। भारत विज्ञान, संस्कृति, लोकतंत्र, तकनीक, स्वास्थ्य और मानवीय सहायता जैसे अनेक क्षेत्रों में अपनी सकारात्मक पहचान बना रहा है। महामारी के दौरान अनेक देशों को दवाइयाँ और वैक्सीन उपलब्ध कराना भारत की इसी मानवीय दृष्टि का उदाहरण था।
अंततः यह कहा जा सकता है कि शांतिपूर्ण और प्रगतिशील विश्व के निर्माण में भारत की भूमिका केवल संभावित नहीं बल्कि अत्यंत आवश्यक है। भारत के पास वह सांस्कृतिक दृष्टि है जो मानवता को जोड़ सकती है, वह लोकतांत्रिक अनुभव है जो विविधता में एकता का संदेश देता है, वह युवा शक्ति है जो भविष्य को बदल सकती है और वह कूटनीतिक संतुलन है जो संघर्षों के बीच संवाद का पुल बन सकता है।
लेकिन यह भूमिका केवल नारों और दावों से पूरी नहीं होगी। इसके लिए भारत को अपने भीतर न्याय, शिक्षा, विज्ञान, सामाजिक सद्भाव और पर्यावरणीय संतुलन को मजबूत करना होगा। जब भारत अपने आदर्शों को व्यवहार में उतारेगा, तभी वह विश्व को वास्तविक दिशा दे सकेगा।
विश्व आज ऐसे नेतृत्व की तलाश में है जो शक्ति के साथ संवेदना भी रखता हो। भारत यदि अपने मूल्यों, ज्ञान और संतुलित दृष्टि के साथ आगे बढ़े, तो वह केवल एक महाशक्ति नहीं बल्कि मानवता के लिए आशा की शक्ति बन सकता है। यही वह मार्ग है जो एक शांतिपूर्ण, समतामूलक और प्रगतिशील विश्व की नींव रख सकता है।

— डॉ. शैलेश शुक्ला

डॉ. शैलेश शुक्ला

राजभाषा अधिकारी एनएमडीसी [भारत सरकार का एक उपक्रम] प्रशासनिक कार्यालय, डीआईओएम, दोणीमलै टाउनशिप जिला बेल्लारी - 583118 मो.-8759411563

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