सामाजिक

मातृ दिवस, भावनाओं का उत्सव या बाजारीकरण का मुखौटा?

मातृ दिवस आते ही सोशल मीडिया स्टेटस और विज्ञापनों की बाढ़ आ जाती है और यह एक ऐसा विषय है जहाँ भावनाएं और वास्तविकता अक्सर आपस में टकराती हैं क्योंकि क्या एक दिन का यह उत्सव सचमुच माँ के प्रति हमारी कृतज्ञता का प्रतीक है या यह महज़ एक आधुनिक दिखावा बनकर रह गया है यह सोचना अनिवार्य है। आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में हम अक्सर उन लोगों को शुक्रिया कहना भूल जाते हैं जो हमारी दुनिया का आधार हैं और इस दृष्टिकोण से मातृ दिवस एक ज़रूरत प्रतीत होता है क्योंकि साल के ३६५ दिन माँ हमारे लिए बिना रुके काम करती है और यह दिन हमें रुककर उसकी अहमियत को महसूस करने का अवसर देने के साथ-साथ कृतज्ञता का स्मरण कराता है। कई बार बच्चे अपनी भावनाएं व्यक्त नहीं कर पाते इसलिए यह दिन एक ‘आइस-ब्रेकर’ की तरह काम करता है जहाँ एक छोटा सा कार्ड या फ़ूल भी सालों की अनकही बातों को कह देता है और माँ के उस अदृश्य श्रम को पहचान दिलाता है जिसे हम अक्सर उसका फ़र्ज़ मानकर अनदेखा कर देते हैं। वहीं यदि सिक्के के दूसरे पहलू को देखें तो यह उत्सव अक्सर दिखावे की भेंट चढ़ता नजर आता है क्योंकि गिफ्टिंग कंपनियां और ब्रांड्स इस दिन को एक ‘सेल्स इवेंट’ में बदल चुके हैं जिससे ऐसा लगता है मानो माँ के प्यार का मोल महंगे उपहारों से ही तय होगा और सोशल मीडिया पर लंबी चौड़ी पोस्ट लिखना लेकिन असल ज़िंदगी में माँ के पास १० मिनट बैठकर बात न करना इस दिन के असली अर्थ को ख़त्म कर देता है। कई बार लोग केवल इसलिए मातृ दिवस मनाते हैं क्योंकि बाकी सब मना रहे हैं और यह दिखावटी प्रतियोगिता वास्तविक प्रेम की जगह ले लेती है जबकि सच्चाई यह है कि माँ को किसी एक विशेष कैलेंडर तारीख़ की ज़रूरत नहीं है क्योंकि उसके लिए आपका समय ही सबसे बड़ा उपहार है। माँ वो है जिसकी जगह कोई और नहीं ले सकता और जिसकी जगह माँ ख़ुद किसी को नहीं लेने देती इसलिए यदि मातृ दिवस मनाने के पीछे का उद्देश्य माँ को खुशी देना और उसे आराम महसूस कराना है तो यह ज़रूरत है लेकिन अगर इसका उद्देश्य केवल डिजिटल मंचों पर ख़ुद को अच्छा बच्चा साबित करना है तो यह सिर्फ़ दिखावा है। अंततः मातृ दिवस को उत्सव की तरह मनाएं लेकिन उसे व्यापार न बनने दें क्योंकि असली सम्मान उस दिन होगा जब हम उनकी राय का आदर करेंगे और उनके स्वास्थ्य का ध्यान रखते हुए उन्हें यह महसूस कराएंगे कि वे केवल माँ नहीं बल्कि एक स्वतंत्र व्यक्ति भी हैं क्योंकि दिखावा उपहारों में होता है और ज़रूरत अहसास में होती है जिसे चुनना हमारे संस्कारों पर निर्भर करता है।

— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़ 

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।