दोहा
मन्जिल उसको ही मिली,जिसको इसकी चाह |
जिसने बाधा,शूल की ,कभी न की परवाह ||
जो हक पाने को अड़े,मिली उन्हे ही जीत |
सोचो जीवन रेंगकर,कहीं न जाये बीत ||
जिनको मरना आ गया,उन्हे मिली बस श्वास
जो लड़कर जीते वही,बनते हैं बस खास ||
जिनको अपने पर नहीं,थोड़ा भी विश्वास |
वो राजा बनते नहीं,सदा रहेगें दास||
महिला तो बस चाहती,मत समझो सामान |
मन से उसको दीजिए,थोडा सा सम्मान ||
खून बहाये बिन यहाँ,किसे मिला है ताज |
रक्तपात के बिन यहाँ,कौन कर सका राज ||
— शालिनी शर्मा
