राष्ट्रहित की नई दिशा : संस्कृति, सुरक्षा और सामाजिक सुधार की ओर बढ़ते कदम
भारत का लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं, बल्कि समाज और शासन की दिशा तय करने वाले निर्णयों से भी मजबूत होता है। हाल के दिनों में तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और असम में नई सरकारों द्वारा लिए गए कुछ निर्णय इस बात का संकेत देते हैं कि अब शासन व्यवस्था केवल राजनीतिक नारों तक सीमित न रहकर सांस्कृतिक चेतना, प्रशासनिक अनुशासन और राष्ट्रीय हित के मुद्दों पर भी गंभीरता से आगे बढ़ रही है।
तमिलनाडु, जहाँ दशकों तक द्रविड़ राजनीति का प्रभाव रहा, वहाँ नई सरकार ने अपने कार्यकाल की शुरुआत “वंदे मातरम्” और राष्ट्रगान से कर एक सांस्कृतिक संदेश देने का प्रयास किया। कहा जा रहा है कि वंदे मातरम् के सभी छंदों का गायन कराया गया, जो राज्य के राजनीतिक इतिहास में एक नई पहल मानी जा रही है। यह केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रीय एकात्मता के प्रति सम्मान का प्रतीक माना जा रहा है।
इसी क्रम में 12 मई को तमिलनाडु सरकार ने एक और महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए मंदिरों, मस्जिदों, गुरुद्वारों तथा शैक्षणिक संस्थानों के 500 मीटर दायरे में स्थित 717 शराब दुकानों को बंद करने के आदेश दिए। यह निर्णय सामाजिक स्वास्थ्य, युवा पीढ़ी के भविष्य और धार्मिक-सांस्कृतिक वातावरण की गरिमा को ध्यान में रखकर लिया गया प्रतीत होता है। लंबे समय से समाज में यह मांग उठती रही थी कि शिक्षा और आस्था के केंद्रों के आसपास नशे के व्यापार को सीमित किया जाए। ऐसे कदम सामाजिक सुधार की दिशा में सकारात्मक संकेत माने जा सकते हैं।
वहीं दूसरी ओर पश्चिम बंगाल में नई सरकार द्वारा प्रशासनिक और सुरक्षा संबंधी कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए जा रहे हैं। अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई से लेकर बांग्लादेश सीमा के पास भूमि उपलब्ध कराने और सीमाओं पर तारबंदी को तेज करने के प्रयास राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। यदि सीमावर्ती क्षेत्रों में प्रभावी फेंसिंग होती है तो अवैध घुसपैठ, तस्करी और अन्य गैरकानूनी गतिविधियों पर नियंत्रण लगाने में सहायता मिलेगी। यह केवल एक राज्य का विषय नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की सुरक्षा और स्थिरता से जुड़ा प्रश्न है।
इसके साथ ही सार्वजनिक सड़कों पर नमाज़ या किसी भी प्रकार के धार्मिक आयोजन को नियंत्रित करने की दिशा में भी चर्चा तेज हुई है। लोकतंत्र में प्रत्येक नागरिक को अपनी आस्था के पालन का अधिकार है, लेकिन सार्वजनिक व्यवस्था, यातायात और सामान्य जनजीवन को बाधित किए बिना धार्मिक गतिविधियाँ हों — यह भी उतना ही आवश्यक है। यदि सरकारें सभी धर्मों के लिए समान नियम और अनुशासन लागू करती हैं, तो इससे कानून व्यवस्था मजबूत होती है और समाज में संतुलन बना रहता है।
असम में भी पिछले कुछ वर्षों में अवैध अतिक्रमण हटाने, सीमावर्ती क्षेत्रों की सुरक्षा मजबूत करने तथा वन भूमि को मुक्त कराने के लिए बड़े स्तर पर अभियान चलाए गए हैं। राज्य सरकार ने लाखों बीघा भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराने का दावा किया है तथा सीमा सुरक्षा और सांस्कृतिक पहचान को “असम के भविष्य” से जोड़ा है। यह केवल प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि स्थानीय समाज, पर्यावरण और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े विषयों को प्राथमिकता देने का प्रयास भी माना जा रहा है।
वास्तव में भारत की शक्ति उसकी विविधता में है, लेकिन यह विविधता तभी सार्थक होती है जब उसके साथ अनुशासन, सांस्कृतिक सम्मान और राष्ट्रीय हित की भावना जुड़ी हो। यदि राज्य सरकारें सामाजिक सुधार, राष्ट्रीय सुरक्षा, सांस्कृतिक मूल्यों और जनहित को प्राथमिकता देकर निर्णय लेती हैं, तो यह देश के भविष्य के लिए सकारात्मक संकेत माना जाएगा। राजनीति का उद्देश्य केवल सत्ता प्राप्त करना नहीं, बल्कि समाज को सही दिशा देना भी होना चाहिए।
— राकेश चंद्र शुक्ला
