कविता

जितनी भी ज़िन्दगी कटी है सब तेरे नाम

जितनी भी ज़िन्दगी कटी है सब तेरे नाम
बुरा किया अच्छा किया है सब तेरा काम
जैसी बुद्धि दी तूने है उसी का परिणाम
अपने कर्मों का फल भुगतेगा क्यों बन रहा अनजान

जिंदगी में किससे मिलना है तुझे नहीं मालूम
किससे मिलाना है यह वही तय है करता
मालूम है तुझे कि जाना पड़ेगा एक दिन खाली हाथ
मोहमाया में फंस गया जाने से बहुत है डरता

बने बनाये खेल को बिगाड़ना
या बिगड़े हुए खेल को बनाना
किसी के हाथ में तो कुछ भी नहीं
अपनी मर्जी से आता है उसको नचाना

कभी करता है वह दिल्लगी
कभी उपहास है उड़ाता
भटकाता है अकेली राहों में
तो फिर राह भी है दिखाता

जिंदगी को जो यूं ही तमाम कर दिया
जिसने दिया सब कुछ उसी को बदनाम कर दिया
अवसर जो मिले आगे बढ़ने के उन्हें गंवा बैठा
दूसरों का जीना भी हराम कर दिया

— रवींद्र कुमार शर्मा

*रवींद्र कुमार शर्मा

घुमारवीं जिला बिलासपुर हि प्र