कविता

छोटी-छोटी सी खुशियॉं

छोटी-छोटी सी खुशियॉं, महकाती जीवन की बगिया,
चेहरे पर मुस्कान खिलाती, अनूठी पहचान बन जाती,
बूॅंद-बूॅंद खुशी का प्राणायाम, तन-मन को देती आराम,
दुःखों के बादल मिटाती, सुकून की बारिश बन जाती ।

भावों की मीठी-मीठी मिसरी, मन की चमकीली ढिबरी,
परिवार में प्रेम बढ़ाती, पल-पल को नव रंगों से सजाती,
जीवन का बन हिस्सा, अगली-पिछली यादों का किस्सा,
प्रेम भाव साझा करती, भीतर-बाहर को मधुरम बनाती ।

भावों की रसीली मंजरी, यादों की बनकर सुंदर गठरी,
जीवन में आस उजास भरती, संजीवनी सी ये बहती,
खुशियों का कारण बन जाना ,”आनंद” जीवन में बहाना,
खुशियॉं दिलों को पास लाती, जीवन अनुराग बढ़ाती ।

जी लेना भरपूर वर्तमान, कल क्या होगा किसको ज्ञान,
खुशियॉं ढाल बन जाती, सकारात्मकता को ये बढ़ाती,
सबसे पहले है परिवार, मत रोकना खुशियों की धार,‌
ये साथ को दिलचस्प बनाती, सार्थक एहसास जगाती ।

चार दिन की जिंदगानी, कब खत्म हो अपनी कहानी,
बड़ों छोटों को लुभाती, ये परिवार को नेह से सजाती,
छोटी-छोटी खुशियों का बन गीत, जग में फैलाना प्रीत,
ये मन-मस्तिष्क का द्वंद्व मिटाती, अहम को भी घटाती ।

— मोनिका डागा “आनंद”

*मोनिका डागा 'आनंद'

चेन्नई, तमिलनाडु