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वेद 3000 साल पुराने हैं… या 1,96,08,53,127 साल?

वेद मनुष्य के रचे नहीं, परमेश्वर के ज्ञान हैं। आर्यसमाज की मान्य गणना के अनुसार विक्रम संवत् 2083 में सृष्टि और वेदों को बने 1,96,08,53,127 वर्ष हो चुके हैं। यूरोप वाले 2400-3100 साल बताते हैं। कौन सच बोल रहा है?
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परोपकारिणी सभा अजमेर द्वारा प्रकाशित महर्षि दयानन्द सरस्वती कृत ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका अध्याय 2 वेदोत्पत्तिविषयः

वेदों की आयु कितनी? महर्षि का उत्तर-

ब्राह्मस्य तु क्षपाहस्य यत्प्रमाणं समासतः।
एकैकशो युगानां तु क्रमशस्तन्निबोधत ॥ १ ॥
चत्वार्याहुः सहस्राणि वर्षाणां तु कृतं युगम्।
तस्य तावच्छती सन्ध्या सन्ध्यांशश्च तथाविधः ॥ २ ॥
इतरेषु ससन्ध्येषु ससन्ध्यांशेषु च त्रिषु।
एकापायेन वर्तन्ते सहस्राणि शतानि च ॥ ३ ॥
यदेतत् परिसंख्यातमादावेव चतुर्युगम्।
एतद् द्वादशसाहस्त्रं देवानां युगमुच्यते ॥ ४ ॥
दैविकानां युगानां तु सहस्त्रं परिसंख्यया।
ब्राह्ममेकमहर्ज्ञेयं तावती रात्रिरेव च ॥ ५ ॥
तद्वै युगसहस्त्रान्तं ब्राह्मं पुण्यमहर्विदुः।
रात्रिं च तावतीमेव तेऽहोरात्रविदो जनाः ॥ ६ ॥
यत्प्राग्द्वादशसाहस्त्रमुदितं दैविकं युगम्।
तदेकसप्ततिगुणं मन्वन्तरमिहोच्यते ॥ ७ ॥
मन्वन्तराण्यसंख्यानि सृष्टिः संहार एव च।
क्रीडन्निवैतत्कुरुते परमेष्ठी पुनः पुनः ॥ ८ ॥
मनु० अध्याये १ [श्लोकाः ६८-७३, ७९, ८०] ॥

एकं दश शतं चैव सहस्त्रमयुतं तथा।
लक्षं च नियुतं चैव कोटिरर्बुदमेव च ॥ १ ॥
वृन्दः खर्वो निखर्वश्च शङ्खः पद्मं च सागरः।
अन्त्यं मध्यं परार्द्ध्यं च दशवृद्ध्या यथाक्रमम् ॥ २ ॥
इति सूर्यसिद्धान्तादिषु संख्यायते।

सहस्रस्य प्रमासि सहस्रस्य प्रतिमासि ॥
य० अ० १५ । मं० ६५ ॥
सर्वं वै सहस्त्रं सर्वस्य दातासि ॥
श० कां० ७ । अ० ५ ।

प्रश्न—वेदों की उत्पत्ति में कितने वर्ष हो गये हैं ?
उत्तर—एक वृन्द छानवे करोड़ आठ लाख बावन हजार नव सौ छहत्तर अर्थात् 1,96,08,52,976 वर्ष वेदों की और जगत् की उत्पत्ति में हो गये हैं और यह संवत् सतहत्तरवाँ वर्त रहा है।

[आर्यसमाज मान्य गणना – विक्रम संवत् 2083]
महर्षि ने विक्रम संवत् 1933 में कलियुग के 4976 वर्ष लिखे थे। आज विक्रम संवत् 2083 है।
अतः 4976 + 152 = 5128 वर्ष कलियुग के हो चुके हैं।
इसलिए आज सृष्टि और वेदों की उत्पत्ति को 1,96,08,53,127 वर्ष हो चुके हैं।

प्रश्न—यह कैसे निश्चय हो कि इतने ही वर्ष वेद और जगत् की उत्पत्ति में बीत गये हैं।
उत्तर—यह जो वर्तमान सृष्टि है, इसमें सातवें वैवस्वत मनु का वर्तमान है, इससे पूर्व छः मन्वन्तर हो चुके हैं। स्वायम्भव १, स्वारोचिष २, औत्तमि ३, तामस ४, रैवत ५, चाक्षुष ६, ये छः तो बीत गये हैं और ७ सातवाँ वैवस्वत वर्त रहा है और सार्वणि आदि ७ मन्वन्तर आगे भोगेंगे। ये सब मिलके १४ मन्वन्तर होते हैं। और एकहत्तर चतुर्युगियों का नाम मन्वन्तर धरा गया है। सो उसकी गणना इस प्रकार से है कि 1728000 सत्रह लाख, अट्ठाईस हज़ार वर्षों का नाम सतयुग रक्खा है। 1296000 बारह लाख छानवे हजार वर्षों का नाम त्रेता, 864000 आठ लाख चौंसठ हज़ार वर्षों का नाम द्वापर और 432000 चार लाख बत्तीस हज़ार वर्षों का नाम कलियुग रक्खा है। तथा आर्यों ने एक क्षण और निमेष से लेके एक वर्ष पर्यन्त भी काल की सूक्ष्म और स्थूल संज्ञा बांधी है। और इन चारों युगों के 4320000 तियालीस लाख, बीस हज़ार वर्ष होते हैं, जिनका चतुर्युगी नाम है। एकहत्तर चतुर्युगियों के अर्थात् 306720000 तीस करोड़, सरसठ लाख, बीस हज़ार वर्षों की एक मन्वन्तर संज्ञा की है, और ऐसे-ऐसे छह मन्वन्तर मिलकर अर्थात् 1,84,03,20,000 एक अरब, चौरासी करोड़, तीन लाख, बीस हजार वर्ष हुए, और सातवें मन्वन्तर के भोग में यह 28 अट्ठाईसवीं चतुर्युगी है। इस चतुर्युगी में कलियुग के 5128 पाँच हजार, एक सौ, अट्ठाईस वर्षों का तो भोग हो चुका है और बाकी 4,26,872 चार लाख, छब्बीस हजार, आठ सौ, बहत्तर वर्षों का भोग होने वाला है।

जो पूर्व चतुर्युगी लिख आये हैं, उन एक हजार चतुर्युगियों की ब्राह्मदिन संज्ञा रक्खी है और उतनी ही चतुर्युगियों की रात्रि संज्ञा जाननी चाहिए। सो सृष्टि की उत्पत्ति करके हजार चतुर्युगी पर्यन्त ईश्वर इसको बना रखता है, इसी का नाम ‘ब्राह्मदिन’ रक्खा है, और हजार चतुर्युगी पर्यन्त सृष्टि को मिटा के प्रलय अर्थात् कारण में लीन रखता है उसका नाम ‘ब्राह्मरात्रि’ रक्खा है। अर्थात् सृष्टि के वर्तमान होने का नाम दिन और प्रलय होने का नाम रात्रि है। यह जो वर्तमान ब्राह्मदिन है इसके 1,96,08,53,127 एक अरब, छानवे करोड़, आठ लाख, तिरेपन हजार, एक सौ, सत्ताईस वर्ष इस सृष्टि की तथा वेदों की उत्पत्ति में व्यतीत हुए हैं।

ब्राह्मदिन और ब्राह्मरात्रि अर्थात् ब्रह्म जो परमेश्वर उसने संसार के वर्तमान और प्रलय की संज्ञा की है इसीलिए इसका नाम ब्राह्मदिन है। इसी प्रकरण में मनुस्मृति के श्लोक साक्षी के लिये लिख चुके हैं सो देख लेना। इन श्लोकों में दैववर्षों की गणना की है, अर्थात् चारों युगों के बारह हजार 12000 वर्षों की ‘दैवयुग’ संज्ञा की है। इसी प्रकार असंख्यात मन्वन्तरों में कि जिनकी संख्या नहीं हो सकती अनेक बार सृष्टि हो चुकी है और अनेक बार होगी। सो इस सृष्टि को सदा से सर्वशक्तिमान् जगदीश्वर सहज स्वभाव से रचता, पालन और प्रलय करता है और सदा ऐसे ही करेगा। क्योंकि सृष्टि की उत्पत्ति, वर्तमान, प्रलय और वेदों की उत्पत्ति के वर्षों को मनुष्य लोग सुख से गिन लें, इसीलिए यह ब्राह्मदिन आदि संज्ञा बांधी है। और सृष्टि का स्वभाव नया पुराना प्रति मन्वन्तर में बदलता जाता है इसीलिए मन्वन्तर संज्ञा बांधी है। वर्तमान सृष्टि की कल्पसंज्ञा और प्रलय की विकल्पसंज्ञा की है।

और इन वर्षों की गणना इस प्रकार से करनी चाहिए कि एक १, दश १०, शत १००, हज़ार १०००, दश हजार १००००, एक लाख १०००००, नियुत १००००००, करोड़ १०००००००, अर्बुद १००००, वृन्द १०००००, खर्व १००००००, निखर्व १०००००००, शंख १००००००००, पद्म १०००००, सागर १००००००, अन्त्य १०००००००, मध्य १०००००००० और परार्द्ध्य १०००००, और दश-दश गुणा बढ़ाकर इसी गणित से सूर्यसिद्धान्त और ज्योतिष ग्रन्थों में गिनती की है।

सब संसार की सहस्त्र संज्ञा है तथा पूर्वोक्त ब्राह्मदिन और रात्रि की भी सहस्त्र संज्ञा की जाती है, क्योंकि यह मन्त्र सामान्य अर्थ में वर्तमान है। सो हे परमेश्वर! आप इस हजार चतुर्युगी का दिन और रात्रि को प्रमाण अर्थात् निर्माण करने वाले हो। इसी प्रकार ज्योतिषशास्त्र में यथावत् वर्षों की संख्या आर्य लोगों ने गिनी है सो सृष्टि की उत्पत्ति से लेके आज पर्यन्त दिन-दिन गिनते और क्षण से लेके कल्पान्त की गणित विद्या को प्रसिद्ध करते चले आते हैं, अर्थात् परम्परा से सुनते-सुनाते लिखते-लिखाते और पढ़ते-पढ़ाते आज पर्यन्त हम लोग चले आये हैं। यही व्यवस्था सृष्टि और वेदों की उत्पत्ति के वर्षों की ठीक है, और सब मनुष्यों को इसी को ग्रहण करना योग्य है। क्योंकि आर्य्य लोग नित्यप्रति ‘ओं तत् सत्’ परमेश्वर के इन तीन नामों का प्रथम उच्चारण करके कार्यों का आरम्भ और परमेश्वर का ही नित्य धन्यवाद करते चले आते हैं कि आनन्द में आज पर्यन्त परमेश्वर की सृष्टि और हम लोग बने हुए हैं, और बही खाते की नाई लिखते-लिखाते पढ़ते-पढ़ाते चले आये हैं कि पूर्वोक्त ब्राह्मदिन के दूसरे प्रहर के ऊपर मध्याह्न के निकट दिन आया है और जितने वर्ष वैवस्वत मनु के भोग होने को बाकी हैं उतने ही मध्याह्न में बाकी रहे हैं, इसीलिए यह लेख है—श्रीब्रह्मणो द्वितीये प्रहरार्द्धे०।

यह वैवस्वतमनु का वर्तमान है, इसके भोग में यह 28 अट्ठाईसवीं कलियुग है। कलियुग के प्रथम चरण का भोग हो रहा है तथा वर्ष, ऋतु, अयन, मास, पक्ष, नक्षत्र, मुहूर्त, लग्न और पल आदि समय में हमने फलाना काम किया था और करते हैं, अर्थात् जैसे विक्रम के संवत् 1933 फाल्गुण मास, कृष्णपक्ष, षष्ठी, शनिवार के दिन चतुर्थ प्रहर के आरम्भ में यह बात हमने लिखी है, इसी प्रकार से सब व्यवहार आर्य लोग बालक से वृद्ध पर्यन्त करते और जानते चले आए हैं। जैसे बहीखाते में मिती डालते हैं वैसे ही महीना और वर्ष बढ़ाते घटाते चले जाते हैं। इसी प्रकार आर्य्य लोग तिथिपत्र में भी वर्ष, मास और दिन आदि लिखते चले आते हैं। और यही इतिहास आज पर्यन्त सब आर्यावर्त्त देश में एक सा वर्तमान हो रहा है और सब पुस्तकों में भी इस विषय में एक ही प्रकार का लेख पाया जाता है, किसी प्रकार का इस विषय में विरोध नहीं है। इसीलिए इसको अन्यथा करने में किसी का सामर्थ्य नहीं हो सकता। क्योंकि जो सृष्टि की उत्पत्ति से लेके बराबर मिती वार लिखते न आते तो इस गिनती का हिसाब ठीक-ठीक आर्य्य लोगों को भी जानना कठिन होता, अन्य मनुष्यों का तो क्या ही कहना है। और इससे यह भी सिद्ध होता है कि सृष्टि के आरम्भ से लेके आज पर्यन्त आर्य्य लोग ही बड़े-बड़े विद्वान् और सभ्य होते चले आये हैं।

जब जैन और मुसलमान आदि लोग इस देश के इतिहास और विद्यापुस्तकों का नाश करने लगे तब आर्य्य लोगों ने सृष्टि के गणित का इतिहास कण्ठस्थ कर लिया, और जो पुस्तक ज्योतिषशास्त्र के बच गये हैं उनमें और उनके अनुसार जो वार्षिक पञ्चाङ्गपत्र बनते जाते हैं इनमें भी मिती से मिती बराबर लिखी चली आती है, इसको अन्यथा कोई नहीं कर सकता। यह वृत्तान्त इतिहास का इसलिए है कि पूर्वापर काल का प्रमाण यथावत् सब को विदित रहे और सृष्टि की उत्पत्ति, प्रलय तथा वेदों की उत्पत्ति के वर्षों की गिनती में किसी प्रकार का भ्रम किसी को न हो, सो यह बड़ा उत्तम काम है। इसको सब लोग यथावत् जान लेवें। परन्तु इस उत्तम व्यवहार को लोगों ने टका कमाने के लिये बिगाड़ रक्खा है, यह शोक की बात है। और टके के लोभ ने भी जो इसके पुस्तकव्यवहार को बना रक्खा, नष्ट न होने दिया, यह बड़े हर्ष की बात है। जो चारों युगों के चार भेद और उनके वर्षों की घट बढ़ संख्या क्यों हुई, इसकी व्याख्या आगे करेंगे, वहाँ देख लेना चाहिए, यहाँ इसका प्रसंग नहीं है, इसलिए नहीं लिखा।

यूरोप वालों का झूठ पकड़ा गया

भाषार्थ—अध्यापक विलसन साहेब और अध्यापक मोक्षमूलर साहेब आदि यूरोपखण्डवासी विद्वानों ने बात कही है कि वेद मनुष्य के रचे हैं किन्तु श्रुति नहीं है, उनकी यह बात ठीक नहीं है। और दूसरी यह है—कोई कहता है 2400 चौबीस सौ वर्ष वेदों की उत्पत्ति को हुए, कोई 2900 उनतीस सौ वर्ष, कोई 3000 तीन हजार वर्ष और कोई कहता है 3100 एकतीस सौ वर्ष वेदों को उत्पन्न हुए बीते हैं, उनकी यह भी बात झूठी है। क्योंकि उन लोगों ने हम आर्य्य लोगों की नित्यप्रति की दिनचर्या का लेख और संकल्प पठनविद्या को भी यथावत् न सुना और न विचारा है, नहीं तो इतने ही विचार से यह भ्रम उनको नहीं होता। इससे यह जानना अवश्य चाहिए कि वेदों की उत्पत्ति परमेश्वर से ही हुई है, और जितने वर्ष अभी ऊपर गिन आये हैं उतने ही वर्ष वेदों और जगत् की उत्पत्ति में भी हो चुके हैं। इससे क्या सिद्ध हुआ कि जिन-जिन ने अपनी-अपनी देश भाषाओं में अन्यथा व्याख्यान वेदों के विषय में किया है, उन-उन का भी व्याख्यान मिथ्या है। क्योंकि जैसा प्रथम लिख आये हैं जब पर्यन्त हज़ार चतुर्युगी व्यतीत न हो चुकेंगी तक पर्यन्त ईश्वरोक्त वेद का पुस्तक, यह जगत् और हम सब मनुष्य लोग भी ईश्वर के अनुग्रह से सदा वर्तमान रहेंगे।

इति वेदोत्पत्तिविचारः ॥

सोचने वाली बात

  1. अगर वेद 3000 वर्ष पुराने होते तो 1 अरब 96 करोड़ वर्ष की गणना मनुस्मृति में कैसे लिखी मिलती?
  2. महर्षि ने विक्रम संवत् 1933 में कलियुग के 4976 वर्ष लिखे। आज विक्रम संवत् 2083 है। जोड़ लो – 4976 + 152 = 5128 वर्ष कलियुग के।
  3. मैक्समूलर ने स्वयं माना था कि उसने वेदों का अनुवाद ईसाई मत के प्रचार के लिए तोड़-मरोड़ कर किया।

आज रामकृष्ण की संताने अपने ही धर्म का उपहास मनाने में लगी हैं। अपने वेद-शास्त्र पढ़ो, गर्व करो।