एक ही ठुंकाई में याद आया हम भी राजपूत थे
यूपी के एक शहर में राजपूतों ने जिहादी पत्थरबाजों की जमकर धुनाई उसी छत पर जाकर की जहां से जिहादी पत्थरबाजी कर रहे थे । जबरदस्त ठुंकाई के बाद बहुत सारे मुस्लिम है़ंडल्स ये पोस्ट चलाने लगे कि हम भी राजपूत थे.. हम भी मुस्लिम राजपूत हैं !
लेकिन ध्यान दें… मुस्लिमों की रवायतें हिंदुओं से पूरी तरह अलग होती हैं…
वहां बहन से भी शादी हो सकती है
पाकिस्तान में बहुत सारे मुस्लिम राजपूत गाय का मांस खा रहे हैं
95 प्रतिशत हिंदुस्तानी मुसलमान क्वर्टेड ही हैं
तो इस आधार पर यदि अल तकैया यदि हो रहा है तो हिंदुओं को सावधान रहने की जरूरत है।
मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि देश के अंदर जिहादी इस भाई चारे वाले अल तकैया को आगे बढ़ा रहे हैं । वो रोज़ जिहाद के लिए कोई ना कोई अल तकैया चलाते ही रहते हैं लेकिन किसी भी हिंदू को इस अल तकैया का शिकार नहीं होना चाहिए ।
सच्चाई ये है कि मेवात और देश के लगभग सभी इलाकों में अभी 100 साल पहले भी अधिकांश कन्वर्टेड मुसलमानों के घरों में तुलसी का चौरा और हिंदू धर्मग्रंथ होते ही थे । बंटवारे के बाद आजाद भारत में इनकी घरवापसी और शुद्धि का प्रयास सरकारी स्तर पर होना चाहिए था जो नेहरू सरकार ने शुरू नहीं किया जिसका लाभ जमाते इस्लामी जैसे संगठनों ने उठाया और इन्हीं मुसलमानों को पूरी तरह से कट्टर बनाने के लिए नाना प्रकार के अभियान और तबलीग चलाते रहे । इसका असर अब पूरे भारत में देखा जा रहा है । जिहादी कट्टरपंथ हद से ज्यादा हो चुका है और 50 तरह के जिहाद देश के अंदर लगातार चल रहे हैं ।
हैरानी होती है अभी 50 साल पहले तक गांवों में मुस्लिम राजपूत पूरे हिंदू रीति रिवाजों से विवाह करते थे । बाकायदा दुआर पर सरावन लगाकर छपरा छा कर शादी हुआ करती थी लेकिन तबलीग ने इनको अपनी जड़ों से काट दिया ।
हम मुस्लिम हैंडल्स के द्वारा चलाए गए इस तरह के पोस्ट पर सिर्फ इतना ही कहना चाहते हैं कि वो घरवापसी करें अपने मूल धर्म में वापस लौटें । इसी से विश्व का कल्याण होगा ।
— दिलीप पाण्डेय
