गीत/नवगीत

मन पर लाख सवाल

तीस दिनों के दर्द में, बने न जिसकी ढाल।
उससे चाहो उम्र भर, सेवा फिर हर हाल।।

जननी बनते ही नहीं, जन्मे केवल लाल,
उसके हिस्से आ गया, पीड़ा का भूचाल।।
टूटी नींद, थका बदन, मन पर लाख सवाल—
तीस दिनों के दर्द में, बने न जिसकी ढाल।।

तानों की बरसात में, भीग गई मुस्कान,
“हमने भी सब सह लिया…” सुन-सुन रोए प्राण।।
मरहम की जगहों मिले, शब्दों के ही जाल—
तीस दिनों के दर्द में, बने न जिसकी ढाल।।

रिश्ते केवल काम से, चलते नहीं जनाब,
नेह मिले तो घर लगे, वरना सूना ख्वाब।।
जिस घर में सम्मान हो, वहीं बसे खुशहाल—
तीस दिनों के दर्द में, बने न जिसकी ढाल।।

बहू नहीं उपकरण यह, ना सेवा की खान,
उसके भी अरमान हैं, उसका भी सम्मान।।
प्रेम, सहारा जो मिले, खिल उठे हर हाल—
तीस दिनों के दर्द में, बने न जिसकी ढाल।।

— डॉ. प्रियंका सौरभ

*डॉ. प्रियंका सौरभ

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) facebook - https://www.facebook.com/PriyankaSaurabh20/ twitter- https://twitter.com/pari_saurabh