ग़ज़ल
निराश न हो, हिम्मत न हार, कदम बढ़ा धीरे धीरे
मंज़िल कितनी भी दूर सही तू चलता जा धीरे धीरे
मैंने सुना है दीवारों के कान यहां पर होते हैं
आवाज़ न ऊंची कर अपनी तू बात बता धीरे धीरे
तेरा कैसे रहेगा जबकि रहा नहीं सुल्तानों का
गुरूर तो इस दुनिया में सबका टूट गया धीरे धीरे
कुछ हाकिम की चालों से, कुछ लोगों की नासमझी से
तेरे मेरे सबके दिल में ज़हर घुला धीरे धीरे
कत्ल भरोसे का न पूछो हुआ है किस होशियारी से
ज़ोर का झटका तूने मुझको दोस्त दिया धीरे धीरे
हर आस्तीन में ख़ंजर है यहां हर चेहरे पे चेहरा है
कहा था मुझको अब्बा ने पर मैं समझा धीरे धीरे
अच्छी चीज़ें समझने में दुनिया को वक्त तो लगता है
लोगों पे तेरी ग़ज़लों का नशा चढ़ा धीरे धीरे
— भरत मल्होत्रा
