सामाजिक

नारी का योगदान

नारी का योगदान भारतीय समाज में सर्वत्र व्याप्त है। चाहे संतुलन की बात हो या न्याय की दृष्टि डालने पर अनेकानेक उदाहरण मिल जाते हैं। भारतीय सामाजिक व्यवस्था की इकाई परिवार है जो एक नारी के बिना पूर्ण ही नहीं होता । स्त्री के बिना मकान घर नहीं बन सकता ये सार्वभौमिक सत्य है ।भारतीय समाज की परम्परागत व्यवस्था में महिलायें आजीवन पिता, पति और पुत्र के संरक्षण में जीवन-यापन करती रही हैं ।
एक स्त्री की शक्ति को नकारने वाला व्यक्ति अपनी माँ की शक्ति को भी नकारता है क्योंकि उसकी नजर में औरत सिर्फ एक खिलौने से ज्यादा कभी रही ही नहीं ।अपनी पत्नि की इज्जत करने वाला व्यक्ति जोरू का गुलाम नहीं बल्कि एक अच्छी माँ का अच्छा बेटा होता है जो अपनी माँ के नक़्शे कदम पर ही चलता है । अपनी पत्नि को प्यार और इज्जत भी वही दे सकता है जिसका बचपन उसी तरह के माहौल में गुजरा हो । प्रेम और सम्मान न खरीदे जाते न बेचे जाते बल्कि व्यक्ति के संस्कार में शामिल होते हैं । ये कोई घुट्टी नहीं जो बाजार से लाकर दे दी जाए ,ये तो वो अमृत है जो घरों में बचपन से संस्कार के रूप में पिलाया जाता है । जो अपनी पत्नि से जितना भावनात्मक रूप से जुड़ा होता है ,उसकी तरक्की तो तय है लेकिन आज का दौर सिर्फ इन बातों को नजरअंदाज करके अपनी तरक्की की उम्मीद करता है । पुरानी बातें आज किसको याद है कि #जहाँ नारी का सम्मान होता है वहाँ देवता भी निवास करते हैं //क्योंकि जो इंसान को नहीं मानता उससे पुरानी बातों को मानने को कहना दीवार में सर मारने जैसा है | वो लोग जो नारी को मात्र उपभोग की वस्तु समझते हैं वह न नारी को सम्मान दे सकते हैं न प्रेम । उन लोगों की नजरों में नारी सिर्फ एक कठपुतली से ज्यादा कुछ नहीं ,लेकिन वो भूल जाते हैं कि नारी एक माँ ,बहन ,भाभी और भी बहुत कुछ है । वो जननी भी है ,जब अपने काली रूप में आती है तो सब कुछ संहार करने की भी ताकत रखती है । आज अधिकाँश घरों में नारी ही नारी की दुश्मन बन बैठी है जिसमें सारा परिवार भी पिसता है । यही कारण है कि आज हर स्त्री स्वालम्बन की ओर बढ़ रही है जिससे घर के प्रबंधन पर भी बहुत असर पड़ता है लेकिन कोई इसकी सतह में जाकर सिर्फ उसी स्त्री को दोष देता है ।स्वंत्रता की चाहत में नौकरी करना भी जहाँ आजादी लगती है ।हम उस देश के वासी हैं जहाँ नारी स्वंत्रता की बात पन्नों पर छापी जाती है । बाँध लेती है अपने पैरों में बेड़ियाँ घर और बाहर की अपनी पहचान बनाने को ।हम उस देश के वासी हैं जहाँ स्त्री की पहचान हाउस वाइफ से नहीं नौकरी से आँकी जाती है ।

नारी मन को आहत करना
आसान नहीं था, न हो पायेगा
छली गयी है वो तब तब
जब भी प्रेम की अभिलाषी थी

वो हृदय नही था पत्थर था
जब जब उसको ठुकराया था
पाषाण बनाकर नारी को
क्यों दोषी उसी को माना था

प्रकृति की अनुपम देन भी है
काली के रूप में संहारक भी
देवी के रूप में गर पूजित है
क्यों संबोधन उसका अबला ही

व्यथित हुई तो जल जाओगे
फिर सुकून कहाँ से पाओगे
नारी का जीवन कठिन हुआ
क्या तुम पुरुष रह पाओगे

है हिम्मत आज भी उसमें
सामना कैसे कर पाओगे
नारी कोमल है पर अबला नहीं
क्या सच को स्वीकार कर पाओगे

— वर्षा वार्ष्णेय

*वर्षा वार्ष्णेय

पति का नाम –श्री गणेश कुमार वार्ष्णेय शिक्षा –ग्रेजुएशन {साहित्यिक अंग्रेजी ,सामान्य अंग्रेजी ,अर्थशास्त्र ,मनोविज्ञान } पता –संगम बिहार कॉलोनी ,गली न .3 नगला तिकोना रोड अलीगढ़{उत्तर प्रदेश} फ़ोन न .. 8868881051, 8439939877 अन्य – समाचार पत्र और किताबों में सामाजिक कुरीतियों और ज्वलंत विषयों पर काव्य सृजन और लेख , पूर्व में अध्यापन कार्य, वर्तमान में स्वतंत्र रूप से लेखन यही है जिंदगी, कविता संग्रह की लेखिका नारी गौरव सम्मान से सम्मानित पुष्पगंधा काव्य संकलन के लिए रचनाकार के लिए सम्मानित {भारत की प्रतिभाशाली हिंदी कवयित्रियाँ }साझा संकलन पुष्पगंधा काव्य संकलन साझा संकलन संदल सुगंध साझा संकलन Pride of women award -2017 Indian trailblezer women Award 2017

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