गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

हम रहे देखो सदा बेकार – से।
आज भी डरते नहीं हैं हार से।।

राजशाही ठाठ था हमको मिला।
बचपना गुज़रा तभी बिन मार के।।

सुन तभी से हम ज़मीं पर ही रहे।
वायदा यह तो रहा इक़रार से।।

की मुहब्बत भी तभी सोचकर।
तब मिलेंगे ही हमें तो ख़ार – से।।

देख जज़्बा आज मुखिया की तरह।
अब तलक हम तो चले खुद्दार – से।।

एक दिन तो ये फ़ना होगी सुनो।
ज़िंदगी के पल गुज़ारो प्यार से।।

ज़िंदगी की नाव लगे अब डूबती।
प्रभु तुम ही पार कर दो धार से।।

— रवि रश्मि ‘अनुभूति’

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