आवारा आतंक का साया
गलियों में डर का साया है,
हर चेहरा अब घबराया है।
नन्हें मासूमों की चीखों से,
शहर-गाँव तक कपाया है।
कभी इन बच्चों पर हमला,
कहीं बुज़ुर्ग होते लहूलुहान।
हर एक ‘रोज़’ सुनते घटना,
देख काँप जाता हिन्दुस्तान।
दया तो सभी ‘जीवों’ पर हो,
यहीं संस्कृति की हैं पहचान।
पर मानव जीवन से बढ़कर,
कीमती हैं हम सभी के प्राण।
यूं सड़कों पर आतंक न फैले,
जागृत हो ऐसी कोई राह बने।
हमारी संवेदनाएँ ‘जीवित’ रहे,
जन-जन की भी आवाज़ बने।
इसमें न हो क्रूरता, न लाचारी,
बिन्दास होकर ‘जीता’ इंसान।
कुछ व्यवस्था ऐसी कायम हो,
सुरक्षित हो हर एक की जान।
(संदर्भ – आवारा कुत्ते आतंक का पर्याय)
— संजय एम तराणेकर
