हास्य-व्यंग्य – कमाल है लिपिस्टिक का
आखिर उसकी सुंदरता का राज उसके होंठों पर लगे लिपिस्टिक का कमाल है कि उसके सौंदर्य में चार चांद लग जाते हैं। जब वह निकलती हैं तो इत्र की खुशबू फैल जाती है। सुरम्य वातावरण सा हो जाता है। कई रसिक बंधुओं के हृदय में सतरंगी रंग उभर जाता है। इस तरह से कइयों ने बर्बादी का इतिहास लिख दिया है।
उसके होंठों पर लिपिस्टिक की रंगत से कितनों का घर उजड़ गया। सोहन अपनी पत्नी को अलविदा कह दिया। मुरारी तो उसकी सुंदरता पर इतना मंत्रमुग्ध हो गया कि शराब की लत लग गयी और सड़कों पर बर्बादी की किताब लिख दी।
मनोहर तो गलियों का गीतकार बन बैठा। उसके कंठ से दर्द भरे नगमें निकलना शुरू कर दिया। एक से एक दर्द भरे गीत गाकर नाले में गिरकर जान दे दी। कुछ ने तो आत्महत्या कर ली लेकिन उसके सौंदर्य से आच्छादित होंठो को नहीं छू सके। अत्यधिक सुंदरता भी कई लोगों की विदाई कर दी।
कमजोर हृदय वाले तो उसके होंठो पर प्रेम विरह की कविताएँ लिख दी। एक से एक बढ़कर कविताएँ लिख दी। बेचारे कवि को पता ही नहीं चला कि इतनी सच्चाई भरी कविताएँ लिख दी और वह अमर हो गया।
जब वह खिड़की से झांका तो कई राह चलते युवकों का हृदय मचल उठा और एक से एक कर प्रेम की अग्नि में जलकर वीरगति को प्राप्त कर लिये लेकिन उसके सौंदर्य को प्राप्त करने की अंतिम इच्छा पूर्ण नहीं हो सकी।
यह संपूर्ण दुनिया इसी लिपिस्टिक का कायल हो चुका है। बड़ी-बड़ी कोठियां बिक गयी। बड़ी-बड़ी सल्तनतें बिक गयी। राजा फकीर हो गया। महल खंडहर में तब्दील हो गया पर इस मायावी लिपिस्टिक का मर्म कोई समझ न सका।
— जयचन्द प्रजापति ‘जय’
