सफल लोकतंत्र के लिए पत्रकारों की स्वतंत्रता अनिवार्य
किसी भी लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति उसकी संसद, न्यायपालिका या चुनाव प्रणाली भर से निर्धारित नहीं होती, बल्कि इस बात से तय होती है कि वहाँ पत्रकार कितनी स्वतंत्रता के साथ सत्ता से प्रश्न पूछ सकते हैं। यदि मीडिया भय, दबाव, आर्थिक निर्भरता, राजनीतिक नियंत्रण या दमन के वातावरण में कार्य कर रहा हो, तो लोकतंत्र केवल एक औपचारिक ढाँचा बनकर रह जाता है। एक स्वस्थ लोकतंत्र में मीडिया का कार्य सरकार की प्रशंसा करना नहीं, बल्कि जनहित में सत्ता की जवाबदेही सुनिश्चित करना होता है। इसी कारण विश्व के सभी विकसित लोकतंत्रों में प्रेस की स्वतंत्रता को लोकतंत्र की आत्मा माना गया है। भारत जैसे विशाल और बहुलतावादी देश में यह प्रश्न और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि यहाँ मीडिया केवल सूचना का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना, लोकतांत्रिक विमर्श और नागरिक अधिकारों का प्रहरी भी है। यदि मीडिया सत्ता का प्रवक्ता बन जाए और जनता की आवाज दबने लगे, तो लोकतंत्र का मूल चरित्र धीरे-धीरे कमजोर होने लगता है।
भारत का संविधान अनुच्छेद 19(1)(a) के अंतर्गत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है और सर्वोच्च न्यायालय ने अनेक निर्णयों में स्पष्ट किया है कि प्रेस की स्वतंत्रता इसी अधिकार का अभिन्न अंग है। हालांकि संविधान में “फ्रीडम ऑफ प्रेस” शब्द प्रत्यक्ष रूप से नहीं लिखा गया, फिर भी भारतीय न्यायपालिका ने समय-समय पर यह स्थापित किया कि स्वतंत्र प्रेस लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी आवश्यकता है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भी भारतीय पत्रकारिता ने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध जनमत निर्माण में ऐतिहासिक भूमिका निभाई थी। उस दौर में समाचार पत्र सत्ता के साथ खड़े नहीं थे, बल्कि जनता के साथ खड़े थे। बाल गंगाधर तिलक, गणेश शंकर विद्यार्थी, महात्मा गांधी और बाबूराव विष्णु पराड़कर जैसे अनेक पत्रकारों ने यह सिद्ध किया कि पत्रकारिता का धर्म सत्ता की प्रशंसा नहीं, बल्कि सत्य की रक्षा करना है। यही कारण था कि औपनिवेशिक सरकारें समाचार पत्रों से भयभीत रहती थीं। आज जब भारत स्वयं एक स्वतंत्र लोकतांत्रिक राष्ट्र है, तब यह प्रश्न और अधिक गंभीर हो जाता है कि क्या पत्रकार वास्तव में निर्भय होकर सत्ता से प्रश्न पूछ पा रहे हैं।
विश्व स्तर पर प्रेस की स्वतंत्रता को मापने वाली संस्था ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ द्वारा जारी ‘वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स’ इस संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। वर्ष 2025 की रिपोर्ट में भारत को 180 देशों में 151वाँ स्थान प्राप्त हुआ था, जबकि 2024 में भारत 159वें स्थान पर था। यद्यपि रैंकिंग में कुछ सुधार दिखाई दिया, फिर भी भारत “वेरी सीरियस” श्रेणी में बना रहा। वर्ष 2026 के नवीनतम सूचकांक में भारत पुनः फिसलकर 157वें स्थान पर पहुँच गया। यह स्थिति केवल एक सांख्यिकीय तथ्य नहीं है, बल्कि यह संकेत देती है कि दुनिया भारत में पत्रकारों की कार्य परिस्थितियों, मीडिया स्वायत्तता, कानूनी दबाव, पत्रकारों की सुरक्षा और राजनीतिक हस्तक्षेप को लेकर गंभीर प्रश्न उठा रही है। रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स ने अपनी रिपोर्ट में मीडिया स्वामित्व के अत्यधिक केंद्रीकरण, पत्रकारों के विरुद्ध हिंसा और राजनीतिक दबाव को भारत की प्रमुख चुनौतियों के रूप में चिह्नित किया है।
यह समझना आवश्यक है कि प्रेस फ्रीडम इंडेक्स केवल किसी सरकार की आलोचना करने वाला राजनीतिक दस्तावेज नहीं होता, बल्कि यह कई मानकों के आधार पर तैयार किया जाता है। इसमें पत्रकारों की सुरक्षा, मीडिया की आर्थिक स्वतंत्रता, कानूनी वातावरण, राजनीतिक हस्तक्षेप, सामाजिक दबाव और सूचना तक पहुँच जैसे अनेक कारकों का विश्लेषण किया जाता है। यही कारण है कि नॉर्वे, एस्टोनिया, नीदरलैंड्स और स्वीडन जैसे देश लगातार शीर्ष स्थानों पर बने रहते हैं, क्योंकि वहाँ सरकारों की आलोचना करने वाले पत्रकारों को देशद्रोही नहीं माना जाता। वहाँ मीडिया संस्थानों पर सत्ता का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष नियंत्रण सीमित है और पत्रकारों को प्रश्न पूछने का लोकतांत्रिक अधिकार प्राप्त है। इसके विपरीत जिन देशों में मीडिया को नियंत्रित करने, पत्रकारों को डराने या असहमति को राष्ट्रविरोध बताने की प्रवृत्ति बढ़ती है, वहाँ प्रेस स्वतंत्रता का स्तर गिरने लगता है।
भारत में पिछले कुछ वर्षों में पत्रकारिता को लेकर एक गंभीर वैचारिक संकट भी उभरा है। मीडिया का एक बड़ा वर्ग धीरे-धीरे जनहित से हटकर राजनीतिक ध्रुवीकरण का हिस्सा बनता दिखाई देता है। अनेक टेलीविजन चैनलों पर बहसों का स्तर तथ्यों की जगह शोर, उत्तेजना और राजनीतिक प्रचार तक सीमित होता जा रहा है। पत्रकारिता का मूल उद्देश्य सत्ता से प्रश्न पूछना होता है, लेकिन जब मीडिया स्वयं सत्ता का रक्षाकवच बन जाए, तब लोकतंत्र में संतुलन समाप्त होने लगता है। लोकतंत्र में सरकारें जनता द्वारा चुनी जाती हैं, इसलिए उनकी जवाबदेही भी जनता के प्रति ही होनी चाहिए और मीडिया इस जवाबदेही को सुनिश्चित करने वाला सबसे महत्वपूर्ण माध्यम है। यदि मीडिया “राजा का बाजा” बन जाए और सत्ता की आलोचना को राष्ट्रविरोध या षड्यंत्र बताने लगे, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे जनतंत्र से प्रचारतंत्र में परिवर्तित होने लगता है।
इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब-जब मीडिया पर नियंत्रण बढ़ा, लोकतांत्रिक संस्थाएँ कमजोर हुईं। भारत में 1975 का आपातकाल इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। उस समय सेंसरशिप लागू की गई, समाचार पत्रों पर नियंत्रण स्थापित किया गया और असहमति की आवाजों को दबाने का प्रयास हुआ। बाद में स्वयं अनेक राजनीतिक नेताओं और पत्रकारों ने स्वीकार किया कि वह भारतीय लोकतंत्र का सबसे अंधकारमय काल था। इसी ऐतिहासिक अनुभव ने यह सिद्ध किया कि प्रेस की स्वतंत्रता केवल पत्रकारों का अधिकार नहीं, बल्कि नागरिकों का लोकतांत्रिक अधिकार है। यदि पत्रकार स्वतंत्र नहीं होंगे, तो जनता तक सत्य नहीं पहुँचेगा। यदि जनता तक सत्य नहीं पहुँचेगा, तो नागरिक स्वतंत्र निर्णय नहीं ले पाएँगे। और यदि नागरिक सूचित निर्णय नहीं ले पाएँगे, तो लोकतंत्र केवल चुनावों तक सीमित होकर रह जाएगा।
आज डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया के युग में पत्रकारिता का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। एक ओर डिजिटल प्लेटफॉर्म्स ने अभिव्यक्ति के नए अवसर दिए हैं, वहीं दूसरी ओर फेक न्यूज़, ट्रोल संस्कृति, ऑनलाइन धमकियों और डिजिटल निगरानी जैसी समस्याएँ भी बढ़ी हैं। विशेष रूप से महिला पत्रकारों को सोशल मीडिया पर जिस प्रकार की धमकियों और उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है, वह लोकतांत्रिक समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय है। पत्रकारों के विरुद्ध हिंसा, मुकदमे, गिरफ्तारी या आर्थिक दबाव किसी भी लोकतंत्र के लिए स्वस्थ संकेत नहीं माने जा सकते। आलोचना को लोकतंत्र का शत्रु नहीं, बल्कि उसकी शक्ति माना जाना चाहिए। जो सरकारें आलोचना से डरती हैं, वे अंततः लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करती हैं।
यह भी सत्य है कि मीडिया को स्वयं भी आत्ममंथन की आवश्यकता है। पत्रकारिता का अर्थ अराजकता, अपुष्ट आरोप या पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग नहीं हो सकता। मीडिया की स्वतंत्रता के साथ उसकी जिम्मेदारी भी जुड़ी हुई है। तथ्यों की शुद्धता, नैतिकता, निष्पक्षता और जनहित पत्रकारिता के मूल सिद्धांत हैं। लेकिन इन कमियों का समाधान सरकारी नियंत्रण नहीं हो सकता। मीडिया की गलतियों का उत्तर स्वतंत्र नियामक व्यवस्था, पेशेवर आचार संहिता और न्यायिक प्रक्रिया में निहित है, न कि राजनीतिक हस्तक्षेप में। किसी भी लोकतंत्र में सरकार को यह अधिकार नहीं होना चाहिए कि वह तय करे कि कौन-सा प्रश्न पूछा जाए और कौन-सी खबर दिखाई जाए।
भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाता है। इस दावे की वास्तविक परीक्षा केवल चुनावों से नहीं, बल्कि इस बात से होगी कि यहाँ पत्रकार कितनी स्वतंत्रता के साथ सत्ता से प्रश्न पूछ सकते हैं। यदि पत्रकार भयमुक्त होकर रिपोर्टिंग कर रहे हैं, यदि मीडिया संस्थान आर्थिक और राजनीतिक दबाव से मुक्त हैं, यदि असहमति को देशद्रोह नहीं माना जाता, यदि सत्ता की आलोचना करने वाले पत्रकारों को शत्रु नहीं समझा जाता, तभी लोकतंत्र मजबूत माना जाएगा। लोकतंत्र में मीडिया का कार्य सरकार गिराना नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संतुलन बनाए रखना है। लेकिन यह संतुलन तभी संभव है जब मीडिया स्वतंत्र हो, निर्भीक हो और जनहित के प्रति प्रतिबद्ध हो।
एक सफल लोकतंत्र के लिए यह अनिवार्य है कि पत्रकारों की स्वतंत्रता को केवल संवैधानिक अधिकार के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आवश्यकता के रूप में देखा जाए। सरकारें बदलती रहती हैं, राजनीतिक दल आते-जाते रहते हैं, लेकिन लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता स्थायी होनी चाहिए। मीडिया यदि सत्ता के साथ विलय कर लेगा, तो जनता की आवाज कमजोर पड़ जाएगी। इसलिए किसी भी प्रकार का राजनीतिक, आर्थिक या संस्थागत नियंत्रण पत्रकारिता की आत्मा को क्षति पहुँचाता है। लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति स्वतंत्र नागरिक, स्वतंत्र न्यायपालिका और स्वतंत्र प्रेस में निहित होती है। यदि इनमें से कोई एक भी कमजोर होता है, तो लोकतंत्र का संतुलन डगमगाने लगता है। इसलिए यह केवल पत्रकारों की लड़ाई नहीं, बल्कि लोकतंत्र की रक्षा का प्रश्न है कि मीडिया किसी भी राजा का बाजा नहीं, बल्कि जनता की आवाज बना रहे।
— डॉ. शैलेश शुक्ला
