जो डर गया
जो डर गया समझो मर गया,
तिनका-तिनका टूटकर बिखर गया,
इच्छा शक्ति हारी खड़ी की बीमारी,
आघात ऐसा जीवन “आनंद” लूट गया ।
अरे अरे अरे ! तुमसे ना हो पाएगा,
डर कठपुतली सा नाच नचाएंगा,
जिंदगी की हर संभव खुशी छीन,
रोज मौत के करीब लेता जाएगा ।
जितना डरोगें दुनिया डराती जाएगीं,
नींद चैन सारा पल में छीन ले जाएगीं,
बिना खुद जले होए ना उजाला,
तकदीर खुद के हाथों ही संवर पाएगीं ।
इस डर को डरा कर आगे बढ़ना है,
जो नहीं हो सकता वही तो करना है,
मगरूर दुनिया करती रहे छींटाकशी,
जीवन आनंद में फर्क नहीं पड़ना है ।
याद रखना डर के आगे जीत है,
बेशकीमती जिंदगी का यही गीत है,
बनकर आनंद आनंद लूटाते चलो,
कर्मों पर निर्भर जीवन संगीत है ।
— मोनिका डागा “आनंद”
