कविता

जो डर गया

जो डर गया समझो मर गया,
तिनका-तिनका टूटकर बिखर गया,
इच्छा शक्ति हारी खड़ी की बीमारी,
आघात ऐसा जीवन “आनंद” लूट गया ।

अरे अरे अरे ! तुमसे ना हो पाएगा,
डर कठपुतली सा नाच नचाएंगा,
जिंदगी की हर संभव खुशी छीन,
रोज मौत के करीब लेता जाएगा ।

जितना डरोगें दुनिया डराती जाएगीं,
नींद चैन सारा पल में छीन ले जाएगीं,
बिना खुद जले होए ना उजाला,
तकदीर खुद के हाथों ही संवर पाएगीं ।

इस डर को डरा कर आगे बढ़ना है,
जो नहीं हो सकता वही तो करना है,
मगरूर दुनिया करती रहे छींटाकशी,
जीवन आनंद में फर्क नहीं पड़ना है ।

याद रखना डर के आगे जीत है,
बेशकीमती जिंदगी का यही गीत है,
बनकर आनंद आनंद लूटाते चलो,
कर्मों पर निर्भर जीवन संगीत है ।

— मोनिका डागा “आनंद”

*मोनिका डागा 'आनंद'

चेन्नई, तमिलनाडु

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