हास्य-व्यंग्य : काकरोच बेचारा बेरोजगार
काकरोच बेचारा एक बेरोजगार प्राणी है। पढ़ा-लिखा है। ग्रेजुएट की डिग्री है। मास्टर की भी डिग्री है फिर भी बेचारा परजीवी है। आश्रित जीवन जी रहा है। इस तरह से दुबला- पतला सा दिखता है। कुछ तो कुपोषण के शिकार हैं। मंहगाई डायन इनको भरपूर जीवन नहीं जीने दे रही है।
रोजी-रोटी का विशेष जुगाड़ न होने के कारण कई दिन उपवास भी रह लेते हैं। ये सहनशील होते हैं इसलिए कई दिन बिना खाये जीवित रहते हैं। किसी बेरोजगार काकरोच का कहीं जुगाड़ हो गया तो रोजी-रोटी चलती रहती है।
बेरोजगारी की मार के कारण खूबसूरत गृहिणी नहीं मिल पाती है। किसी तरह से घर गृहस्थी बस जाती है। नून तेल किसी तरह से इकट्ठा हो जाता है। यही काफी है। पूर्ण विटामिन से परिपूर्ण भोज्य पदार्थ कभी नहीं मिला।
देश के कोने-कोने में इनकी संख्या पाई जाती है। प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं। झुंड के झुंड पाये जाते हैं। इनकी गरीब बस्ती होती है। ठीक से साफ-सुथरा जीवन नहीं जी पाते हैं।
कभी-कभी आन्दोलन करते हैं। अनशन पर भी बैठ जाते हैं। यह देशव्यापी होता है।
भले बेरोजगार होते हैं लेकिन कुछ स्वाभिमानी होते हैं। सहनशील भी होते हैं। कोई इनका अपमान नहीं कर सकता है। सर्वोच्च सत्ता भी इनका कुछ भी नहीं उखाड़ सकती है। इनके पास एकता की शक्ति है। देश की सर्वोच्च पार्टी से भी मुकाबला कर सकते हैं। इनके अंदर भी गुटबाजी का गुण पाया जाता है।
— जयचन्द प्रजापति ‘जय
