जलती जमीन, झुलसता जनजीवन और जागती जिम्मेदारी
हाल ही में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया के सबसे गर्म 50 शहरों में से सभी 50 शहर भारत में दर्ज किए गए। यह केवल एक मौसम संबंधी समाचार नहीं है, बल्कि हमारे समय का सबसे बड़ा चेतावनी संकेत है। भीषण गर्मी, तपती धरती, सूखते जलस्रोत, झुलसती फसलें, दम तोड़ते जंगल और प्रदूषण से भरी हवा—ये सब मिलकर हमें बता रहे हैं कि हमने विकास की जिस अंधी दौड़ को प्रगति समझ लिया है, वह वास्तव में विनाश का मार्ग बनती जा रही है।
आज प्रश्न यह नहीं है कि तापमान 45 डिग्री पार कर गया या 50 डिग्री के करीब पहुंच गया। असली प्रश्न यह है कि क्या हमने अपने ही हाथों अपने भविष्य को आग के हवाले कर दिया है? क्या हमें सचमुच शर्म नहीं आनी चाहिए कि जिस धरती, जल, वायु और प्रकृति ने हमें जीवन दिया, उसी को हमने सबसे अधिक नुकसान पहुंचाया?
मनुष्य ने विज्ञान और तकनीक के सहारे अभूतपूर्व सुविधाएं जुटा लीं। ऊंची-ऊंची इमारतें, चौड़ी सड़कें, लग्जरी कारें, एयर कंडीशनर, विशाल उद्योग, स्मार्ट शहर और डिजिटल जीवन—इन सबको हमने आधुनिक विकास का प्रतीक बना दिया। लेकिन इस तथाकथित विकास ने हमें क्या दिया? सांस लेने लायक हवा तक दूषित हो गई। नदियां जहरीली हो गईं। जंगल कट गए। मिट्टी की उर्वरता घट गई। पक्षियों की आवाजें कम हो गईं। मौसम असंतुलित हो गया।
विडंबना देखिए कि हम जिस सुविधा के लिए एसी खरीद रहे हैं, वही एसी पृथ्वी को और अधिक गर्म कर रहा है। हम जिस तेजी से कंक्रीट के जंगल बना रहे हैं, वही धरती की प्राकृतिक ठंडक को खत्म कर रहे हैं। शहरों में पेड़ों की जगह पार्किंग बन रही है। तालाबों की जगह मॉल बन रहे हैं। खेतों की जगह कॉलोनियां उग रही हैं। और फिर हम शिकायत करते हैं कि गर्मी बहुत बढ़ गई है।
सच यह है कि प्रकृति कभी अचानक प्रतिशोध नहीं लेती। वह पहले चेतावनी देती है। बाढ़, सूखा, चक्रवात, अनियमित वर्षा, लू और ग्लेशियरों का पिघलना—ये सब उसी चेतावनी के संकेत हैं। लेकिन हमने हर चेतावनी को नजरअंदाज किया। क्योंकि हमारा ध्यान केवल उपभोग पर था। अधिक कमाने, अधिक खरीदने और अधिक दिखाने की संस्कृति ने हमें प्रकृति से दूर कर दिया।
आज भारत के अनेक शहर “हीट आइलैंड” बन चुके हैं। वहां सीमेंट और डामर इतनी गर्मी सोख लेते हैं कि रात में भी तापमान कम नहीं होता। गांवों में जहां कभी पेड़ों की छांव और मिट्टी की नमी वातावरण को संतुलित रखती थी, वहां भी अब तेजी से कंक्रीट फैल रहा है। प्राकृतिक जीवनशैली का स्थान कृत्रिम जीवन ने ले लिया है।
सबसे दुखद बात यह है कि इस संकट की सबसे बड़ी कीमत गरीब और मेहनतकश वर्ग चुका रहा है। मजदूर, रिक्शाचालक, किसान, निर्माण कार्य करने वाले श्रमिक, ठेला लगाने वाले लोग—वे लोग जो खुले आसमान के नीचे काम करने को मजबूर हैं—सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं। अमीर लोग एसी कमरों में बैठकर गर्मी से बच सकते हैं, लेकिन सड़क पर काम करने वाला मजदूर कहां जाए? खेत में काम करने वाला किसान किस छांव में बैठे?
जब तापमान 48-50 डिग्री तक पहुंचता है, तब केवल मौसम नहीं बदलता, बल्कि जीवन की मूल संरचना प्रभावित होती है। शरीर का संतुलन बिगड़ता है। जल संकट बढ़ता है। बिजली की मांग बढ़ती है। स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव बढ़ता है। फसलें खराब होती हैं। पशु-पक्षी मरते हैं। यहां तक कि अर्थव्यवस्था भी प्रभावित होती है।
लेकिन हम अब भी नहीं जाग रहे। हम अब भी पेड़ काट रहे हैं। प्लास्टिक फैला रहे हैं। नदियों को गंदा कर रहे हैं। अत्यधिक ईंधन जला रहे हैं। और सबसे बड़ी बात—हम पर्यावरण को केवल “सरकारी विषय” मानकर अपनी जिम्मेदारी से बच रहे हैं।
क्या केवल सरकारें दोषी हैं? क्या नागरिकों की कोई जिम्मेदारी नहीं? यदि हर व्यक्ति अपने घर के सामने एक पेड़ भी नहीं लगा सकता, यदि हम पानी बचाने की आदत नहीं विकसित कर सकते, यदि हम जरूरत से ज्यादा उपभोग कम नहीं कर सकते, तो फिर केवल भाषणों से पर्यावरण नहीं बचेगा।
हम भारतीय अक्सर अपनी संस्कृति पर गर्व करते हैं। हम कहते हैं कि हमारी परंपरा प्रकृति पूजा की रही है। हम नदियों को मां कहते हैं, पेड़ों को देवता मानते हैं, पर्वतों को पूजते हैं। लेकिन क्या हमारा व्यवहार भी वैसा है? यदि सचमुच हम प्रकृति को पूजते, तो नदियां नालों में नहीं बदलतीं। जंगल उजड़ते नहीं। हवा जहरीली नहीं होती।
यह समय आत्ममंथन का है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि हमने विकास की परिभाषा गलत बना ली। वास्तविक विकास वह नहीं जो केवल आर्थिक आंकड़ों में दिखाई दे। वास्तविक विकास वह है जिसमें मनुष्य और प्रकृति दोनों सुरक्षित रहें। जहां उद्योग भी हों और जंगल भी। जहां सड़कें भी हों और नदियां भी स्वच्छ रहें। जहां तकनीक भी हो और पर्यावरण भी संतुलित रहे।
आज आवश्यकता “सतत विकास” की है। ऐसा विकास जो भविष्य की पीढ़ियों का अधिकार न छीने। हमें सौर ऊर्जा, वर्षा जल संरक्षण, जैविक खेती, सार्वजनिक परिवहन, हरित भवन और वृक्षारोपण जैसे उपायों को केवल योजनाओं तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि इन्हें जीवनशैली बनाना होगा।
विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में पर्यावरण शिक्षा केवल किताबों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। बच्चों को प्रकृति से जोड़ना होगा। उन्हें यह समझाना होगा कि पेड़ केवल ऑक्सीजन देने वाली वस्तु नहीं, बल्कि जीवन के रक्षक हैं। जल केवल संसाधन नहीं, बल्कि अस्तित्व है।
मीडिया की भी बड़ी जिम्मेदारी है। पर्यावरण संबंधी खबरें केवल एक दिन की सनसनी बनकर नहीं रहनी चाहिए। जिस गंभीरता से राजनीति, क्रिकेट या मनोरंजन की चर्चा होती है, उसी गंभीरता से जलवायु संकट पर राष्ट्रीय बहस होनी चाहिए।
धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं को भी आगे आना होगा। यदि लाखों लोगों को एकत्र करने वाली संस्थाएं पर्यावरण संरक्षण का अभियान चलाएं, तो समाज में बड़ा परिवर्तन संभव है।
हमें यह भी समझना होगा कि प्रकृति के साथ अन्याय अंततः मनुष्य के खिलाफ अपराध बन जाता है। यदि नदियां सूखेंगी, तो पानी के लिए संघर्ष होगा। यदि खेती प्रभावित होगी, तो खाद्य संकट बढ़ेगा। यदि तापमान लगातार बढ़ता रहा, तो अनेक शहर रहने योग्य नहीं बचेंगे।
आज हम जिस सुविधा-प्रधान जीवन को सफलता समझ रहे हैं, वही भविष्य में हमारे बच्चों के लिए अभिशाप बन सकता है। सोचिए, यदि आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ हवा ही न मिले, यदि पीने योग्य पानी दुर्लभ हो जाए, यदि गर्मी के कारण सामान्य जीवन जीना कठिन हो जाए, तो हमारी उपलब्धियों का क्या अर्थ रह जाएगा?
हम मंगल ग्रह पर जीवन खोजने की बात कर रहे हैं, लेकिन पृथ्वी पर जीवन बचाने के लिए तैयार नहीं हैं। यह आधुनिक सभ्यता का सबसे बड़ा विरोधाभास है।
यह संपादकीय केवल सरकारों या उद्योगपतियों की आलोचना नहीं है। यह हम सबके लिए आईना है। हम सब इस संकट के सहभागी हैं। जब तक हम अपनी आदतें नहीं बदलेंगे, तब तक केवल नीतियां पर्याप्त नहीं होंगी।
हमें अपनी जीवनशैली पर पुनर्विचार करना होगा। जरूरत और लालच के बीच अंतर समझना होगा। प्रकृति को केवल संसाधन नहीं, बल्कि साझेदार मानना होगा।
क्योंकि अंततः सबसे बड़ा सत्य यही है—यदि जीवन का आधार ही समाप्त हो जाएगा, तो जीवन को आसान बनाने वाली तमाम सुविधाएं किसी काम की नहीं रहेंगी।
एक दिन ऐसा भी आ सकता है जब हमारे पास आलीशान घर होंगे, लेकिन पीने के लिए पानी नहीं होगा; महंगी कारें होंगी, लेकिन बाहर निकलने लायक मौसम नहीं होगा; तकनीक होगी, लेकिन स्वस्थ जीवन नहीं होगा।
इसलिए अभी भी समय है। हमें रुकना होगा, सोचना होगा और बदलना होगा। वरना आने वाली पीढ़ियां हमसे यही पूछेंगी कि जब पृथ्वी जल रही थी, तब तुम क्या कर रहे थे?
— डॉ. शैलेश शुक्ला
