छाँव अमराई की
अमराई की छांव सुहानी, मनवा गीत सुनाए है,
भीनी-भीनी खुशबू से, यह जीवन महकाए है।
कोयल मीठी तान सुनाए, पवन रागिनी गाए,
डाल-डाल पर झूले सावन, सपनों को सहलाए।
माटी की सौंधी खुशबू फिर, मन में रस बरसाए है,
अमराई की छांव सुहानी, मनवा गीत सुनाए है।
बचपन की भोली गलियाँ, फिर आँखों में छा जाएँ,
कच्चे आमों की वो फाँके, मन को बहुत लुभाएँ।
नदिया जैसे कल-कल बहकर, मीठी याद जगाए है,
अमराई की छांव सुहानी, मनवा गीत सुनाए है।
धूप थकी जब इन राहों में, छाया आँचल फैलाए,
हर दुखियारे मन को अपने, नेह-सुधा से भर जाए।
प्रेम, सरलता और अपनापन, हर दिल को हरषाए है,
अमराई की छांव सुहानी, मनवा गीत सुनाए है।
— मंजूषा श्रीवास्तव “मृदुल”
