जादू टोना,डर और अज्ञानता का कॉरपोरेट व्यापार
इतिहास, संस्कृति और मानवीय मूल्यों के मामले में हमारा समाज जितना प्राचीन और समृद्ध रहा है, दुर्भाग्य से यहाँ अंधविश्वास, जादू-टोने और ढोंग की जड़ें भी उतनी ही गहरी हैं। यह एक ऐसी भयानक सामाजिक और मानसिक त्रासदी है, जिसकी बलि चढ़कर लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपना मानसिक सुकून, आपसी रिश्ते और जीवन भर की गाढ़ी कमाई एक अंधे कुएँ में झोंक देते हैं। आज के इस आधुनिक दौर में, जहाँ विज्ञान और तकनीक हर रोज़ नए आयाम स्थापित कर रहे हैं, एक बड़ा और अनुत्तरित सवाल हमारे सामने खड़ा है कि एक पढ़ा-लिखा और सभ्य समाज भी किसी कथित “बाबा”, “तांत्रिक” या “ओझा” के कदमों में अपनी इज्जत, विवेक और दौलत क्यों ढेर कर देता है?
यदि हम इस गोरखधंधे की ऐतिहासिक और सामाजिक पृष्ठभूमि को देखें, तो समझ आता है कि सदियों से चली आ रही कुछ अज्ञानतापूर्ण रूढ़ियाँ और कुरीतियाँ अनजाने में हमारे अवचेतन मन का हिस्सा बन गई हैं। हमारे लोक-किस्सों, दंतकथाओं और काल्पनिक कहानियों में अलौकिक शक्तियों, अदृश्य बाधाओं और जादूगरों का ज़िक्र इस प्रचुरता के साथ किया गया कि एक आम इंसान हकीकत और वहम (भ्रम) के बीच का महीन अंतर ही भूल गया। यह मानसिक कमज़ोरी पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती रही और आज एक गंभीर सामाजिक बीमारी का रूप ले चुकी है।
लोगों के इस दलदल में फंसने और सब कुछ लुटा देने के पीछे सबसे बड़ी वजह समाज में व्याप्त घोर मजबूरी, निराशा और डर है। जब एक इंसान जीवन की कड़वी सच्चाइयों और अप्रत्याशित चुनौतियों से घबरा जाता है—चाहे वह संतान का न होना हो, घरेलू या पारिवारिक कलह हो, विवाह में आ रही लगातार रुकावटें हों, या फ़िर वर्षों की बेरोजगारी और अचानक आया आर्थिक संकट हो,तो वह किसी भी चमत्कारी और तात्कालिक सहारे की तलाश में अंधा हो जाता है। रही-सही कसर “किसी ने कुछ कर दिया है” या “व्यापार पर बंधन लगा दिया है” का काल्पनिक ख़ौफ़ पूरी कर देता है। अपनों का अविश्वास और विरोधियों का यही डर लोगों को हर वक्त वहम में रखता है, और इसी मानवीय डर का सीधा फ़ायदा ये ढोंगी और पाखंडी बाबा उठाते हैं।
हमारे समाज की एक और सबसे बड़ी कमज़ोरी यह है कि यहाँ मेहनत, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और धैर्य के बजाय रातों-रात चमत्कार देखने और ‘शॉर्टकट’ से सब कुछ हासिल करने की तीव्र लालसा पाई जाती है। यही शॉर्टकट की चाहत इंसान को इन लुटेरों के दरवाज़ों तक खींच ले जाती है। खुद को दैवीय या चमत्कारी शक्तियों का स्वामी बताने वाले ये ठग दरअसल मनोविज्ञान के शातिर उस्ताद होते हैं। इनका काम करने का तरीक़ा बेहद संगठित और सुनियोजित होता है। ये पीड़ित को देखते ही उसके चेहरे के हाव-भाव, उसकी घबराहट या उसकी सामान्य बातों से उसकी कमजोरी और परेशानी भांप लेते हैं। इनका पहला और अचूक वाक्य अक्सर यही होता है,”तुम्हारे किसी करीबी या बहुत प्रिय रिश्तेदार ने तुम पर कुछ करा दिया है।”यह एक ऐसा तीर है, जो लगभग हर घर की कहानी पर सटीक बैठ जाता है और पीड़ित तुरंत उनके वश में आ जाता है।
इसके बाद शुरू होता है डर का असली और घिनौना व्यापार। कथित संकट के निवारण और समाधान के नाम पर दुर्लभ, अजीबोगरीब और अमानवीय चीजों की मांग की जाती है, जैसे किसी विशेष बेजुबान जानवर की बलि, श्मशान की मिट्टी, अजीब सूखी हड्डियां, या अत्यंत महंगे अनुष्ठान और ताबीज़। जब एक बार इंसान इनके चंगुल में आर्थिक और मानसिक रूप से फंस जाता है, तो उसे और अधिक डराया जाता है कि “यदि अब यह प्रक्रिया बीच में रोक दी, तो तुम्हारा सर्वनाश हो जाएगा या परिवार में किसी की असमय मौत हो जाएगी।” इस ख़ौफ़ के मारे लोग अपने जीवन भर की जमापूंजी, गहने, गाड़ियां और यहाँ तक कि पुश्तैनी जमीनें तक बेचकर इन ठगों की तिजोरियां भरते रहते हैं।
इस अंधविश्वास के सामाजिक और पारिवारिक दुष्परिणाम इतने डरावने और आत्मघाती हैं कि उनका आकलन केवल पैसों से नहीं किया जा सकता। एक छोटे से वहम के कारण सगे भाई-बहन, माता-पिता और हंसते-खेलते परिवार एक-दूसरे के खून के प्यासे हो जाते हैं, क्योंकि किसी ढोंगी ने चंद पैसों के लिए उनके मन में अविश्वास और नफ़रत का बीज बो दिया होता है। इतना ही नहीं, इन अज्ञानी और चरित्रहीन ढोंगियों के आश्रमों और ठिकानों पर मासूम महिलाओं का शारीरिक, मानसिक और आर्थिक शोषण होना एक आम बात बन चुकी है। हद तो तब हो जाती है जब ‘असर’ या ‘साया’ हटाने के नाम पर मासूम और बीमार लोगों को खंभों से बांधकर बेरहमी से पीटा जाता है, गर्म सलाखों से दागा जाता है या जहरीली चीजें खिलाई जाती हैं, जिसके कारण अब तक अनगिनत मासूम लोग तड़प-तड़प कर अपनी जान गंवा चुके हैं।
इस गहरे अंधकार और दलदल से बाहर निकलने का एकमात्र रास्ता शिक्षा, तार्किक सोच और आत्मबल है। जब इंसान का यह विश्वास अडिग हो जाए कि जीवन के उतार-चढ़ाव प्रकृति के सार्वभौमिक नियमों, हमारी अपनी मेहनत, सूझबूझ और परिस्थितियों के अधीन हैं, और दुनिया का कोई भी तीसरा व्यक्ति बैठकर किसी का भाग्य नहीं बदल सकता, तब सारे वहम खुद-ब-खुद दम तोड़ देते हैं। चमत्कार और जादू-टोने के नाम पर चलने वाला यह पूरा तमाशा दरअसल “डर और अज्ञानता का कॉरपोरेट व्यापार” है, जो केवल हमारी कमज़ोरी पर फ़लता-फ़ूलता है।
समय आ गया है कि हम जागें। जब तक हमारे समाज में वैज्ञानिक चेतना और व्यावहारिक समझ जागृत नहीं होगी, जब तक हम शारीरिक या मानसिक बीमारियों के इलाज के लिए इन ढोंगियों के पास भटकने के बजाय योग्य डॉक्टरों और मनोचिकित्सकों की मदद नहीं लेंगे, तब तक ये लुटेरे इसी तरह हमारी मजबूरियों का सौदा करते रहेंगे। आइए, अपनी सोच को बदलें, अंधविश्वास के इस जाल को तर्क और विवेक की कसौटी पर परखें और एक जागरूक, स्वस्थ और प्रगतिशील समाज के निर्माण में अपना योगदान दें। यही समय की सबसे बड़ी पुकार है।
— डॉ. मुश्ताक अहमद शाह ‘सहज’
