अर्द्धनारीश्वर
मैं हूँ स्त्री, मैं ही पुरुष, अर्द्धनारीश्वर की हूँ कृति,
फिर क्यों जग के इस आँगन में, होती हमारी दुर्गति?
हाँ मैं किन्नर हूँ दुनिया में, सहता हर पल सौ आघात,
फिर भी देता हूँ आशीषें,तुमको हँसकर दिन और रात
जिस माता की पावन कोख से,तुम सबने है जनम लिया,
उसी प्रसव की प्रखर पीर को, सहकर मेरा जनम हुआ
फिर क्यों मेरी परवरिश जुदा, क्यों बचपन में अनाथ किया?
वही इंद्रियाँ,वही चेतना,फिर क्यों जग से दूर किया?
ताली ही जीवन की भाषा, खुशियों में हम गाते हैं,
अपनी छाती की सुलगन को,हँसकर हम बिसराते हैं।
गए मनाने जश्न जहाँ हम,अपनी ही उस चौखट पर,
ममता की वह मूरत पिघली,नहीं हमारी हालत पर।
दाँतों तले दबा जो सिक्का, बटुए का शुभ मान हुआ,
चौराहे पर खड़े हुए तो,क्यों मेरा अपमान हुआ?
बंद काँच की गाड़ी में जब, दिखा पिता का क्रूर बदन,
खंजर सा वो दृश्य उतर गया,चीर गया मेरा ये मन।
अश्रुपूरित नैनों से देखा, विदा हुए जब जन्मदाता,
पीकर सारे अश्रु कह दिया,सुखी रहे तेरा भ्राता।
जीये लाल, खुश रहे लाडला, भले हमारा बुरा हाल,
ताली अगर न बजे यहाँ तो,चूल्हा जले न एको साल।
किन्तु बदलती आज हवाएँ, मिटने को तैयार तिमिर,
टाटा की पावन माटी ने, हर ली सारी पीर-रुधिर।
अब रोज़गार सम्मान मिला है, मुख्यधार से नाता है,
ताली का यह हाथ देश का, अब भविष्य लिख जाता है।
— सविता सिंह मीरा
