कालिया का ख़ौफ़
चंबल की सुलगती फ़िज़ाओं में सिर्फ़ बारूद की तीखी गंध और ख़ून के कतरे ही नहीं तैरते थे, बल्कि एक ऐसा साया भी मंडरा रहा था जो इंसानी आँखों से ओझल था, मगर उसका वजूद हर थरथराते पत्ते और हर कँपकँपाती घाटी में महसूस होता था। वह था ‘कालिया’ चंबल की तारीख़ का सबसे शातिर, बेरहम और ज़हीन डक़ैत। वह सिर्फ़ टेरिटरी या थानों पर हुकूमत नहीं करना चाहता था, उसका असली मक़सद चंबल के ग़ुरूर और हुस्न की मल्लिका, ‘जौहर’ पर अपना कब्ज़ा जमाना था।
कालिया कोई आम बाग़ी नहीं था, वह एक ऐसा खौफ़नाक सस्पेंस था जिसे आज तक किसी ने उजाले में नहीं देखा था। वह किसी आसमानी आफ़त की तरह अचानक क़यामत ढाता, तबाही का मंज़र लिखता और हवा के झोंके की तरह बीहड़ों की भूलभुलैया में ग़ायब हो जाता। उसे पकड़ना तो दूर, उसकी परछाईं को छूना भी नामुमकिन था।
विक्रम और जौहर का मिलना कोई आम मिलन नहीं था। जब पहली बार दोनों का आमना-सामना चंबल के एक पुराने मंदिर के पीछे हुआ था, तो आँखों में प्यार के क़सीदे नहीं, बल्कि एक-दूसरे के ख़ून की प्यास थी। विक्रम चंबल का बेताज बादशाह था और जौहर अपनी कसमों की आग में जलती एक आज़ाद शेरनी। पहली ही नज़र में दोनों के बीच ऐसी तक़रार हुई कि बंदूकें तन गईं। विक्रम को जौहर का मगरूर अंदाज़ खटकता था, और जौहर को विक्रम का हुक्म चलाना बर्दाश्त नहीं था। गिरोह के लोग डरते थे कि ये दोनों मिलकर एक-दूसरे को ही न मार डालें।
मगर नियति को कुछ और ही मंज़ूर था। दिल का असली मामला तो उस एक तूफ़ानी रात को शुरू हुआ, जिसे आज भी चंबल की हवाएं याद करती हैं।
वह ‘गुफा वाली रात’ थी। पुलिस ने पूरे बीहड़ को घेर रखा था। चारों तरफ़ से मोर्टार और लाइटों की रोशनी बीहड़ को चीर रही थी। अपनी जान बचाते और पुलिस को छकाते हुए विक्रम और जौहर अपने अपने गिरोह से बिछड़ गए और एक बेहद तंग, अंधेरी और प्राचीन गुफा में छिपने पर मजबूर हो गए। बाहर मूसलाधार बारिश शुरू हो चुकी थी और बिजलियाँ कड़क रही थीं।
गुफा के भीतर सिर्फ सन्नाटा था और दोनों की तेज़ चलती सांसें। विक्रम के कंधे पर पुलिस की एक गोली छूकर निकल गई थी, जिससे ख़ून बह रहा था। जौहर, जो हमेशा विक्रम से लड़ती रहती थी, उस रात उसका दिल मोम हो गया। उसने अपनी रेशमी ओढ़नी का एक हिस्सा फाड़ा, गुफा के कोने में सूखी लकड़ियों से छोटी सी आग जलाई और विक्रम के ज़ख्म पर पट्टी बांधने लगी।
जब जौहर के कांपते हुए हाथ विक्रम के चौड़े सीने पर टिके, तो पहली बार दोनों की निगाहें इतनी नज़दीक से टकराईं। आग की मद्धम रोशनी में जौहर के चेहरे पर पानी की बूंदें चमक रही थीं और विक्रम की आँखों में एक अजीब सा ठहराव था। जो तकरार महीनों से बारूद बनकर सुलग रही थी, वह उस रात गुफा की तन्हाई में पिघलकर मुकम्मल मोहब्बत में तब्दील हो गई। विक्रम ने जौहर का हाथ थाम लिया और जौहर ने अपनी ज़िद को भुलाकर विक्रम के कंधे पर अपना सर रख दिया। उस खौफ़नाक रात में, मौत के साये के ठीक नीचे, चंबल के दो बागियों ने एक-दूसरे के दिलों में अपनी सल्तनत लिख दी थी।
इसी गुफा वाली रात के हादसों के बाद, विक्रम और जौहर के दिलों की दूरियां पूरी तरह सिमट चुकी थीं। एक धुंधली शाम, जब सूरज पहाड़ियों के पीछे दम तोड़ रहा था, जौहर बीहड़ के बीच से बहते एक पहाड़ी झरने के पास अकेली खड़ी अपनी बंदूक साफ़ कर रही थी और उसके चेहरे पर गुफा वाली रात की यादों की एक मद्धम मुस्कान थी।
तभी… ठांय!’ बंदूक चली,
एक सनसनाती हुई गोली उसकी ज़ुल्फ़ों को छूती हुई ठीक पीछे की काली चट्टान से टकराई। जौहर ने पलक झपकते ही अपनी राइफ़ल तानी और पोजीशन ली। मगर जब उसकी नज़र चट्टान पर पड़ी, तो उसके रोंगटे खड़े हो गए। गोली जहाँ टकराई थी, वहाँ ताज़ा इंसानी खून से एक खत चिपका हुआ था। जौहर ने आगे बढ़कर उसे पढ़ा।
“दस्यु सुंदरी जौहर, चंबल के इस सुलगते ताज पर सिर्फ़ और सिर्फ़ कालिया का हक़ है, और उस ताज की असली ज़ीनत (शान) तुम हो। सुना है गुफा की उस रात तुम विक्रम के करीब आ गई हो? याद रखना, विक्रम की बाहों में सिर्फ़ मौत का सन्नाटा है, मेरी पनाह में आओगी तो इस पूरे इलाके पर हुकूमत करोगी। फ़ैसला तुम्हारा है—ताज या कफ़न?”
जौहर ने गुस्से से तमतमाते हुए चारों तरफ़ देखा। दूर-दूर तक सिर्फ बबूल के कँटीले पेड़ थे, सूखी झाड़ियाँ थीं और हवा में एक ऐसी डरावनी, अट्टहास करती हंसी गूंज रही थी जो दिल को दहला दे। कालिया आया, अपना ख़ूनी पैग़ाम छोड़ गया, मगर कोई उसे देख न पाया। बीहड़ एक बार फ़िर उसकी जासूसी से थर्रा उठा।
कुछ दिनों बाद, एक बार फिर विक्रम और जौहर के बीच किसी गुप्त रणनीति को लेकर तीखी बहस हो गई। मोहब्बत होने के बाद भी दोनों के स्वाभिमानी तेवर गर्म थे और वे एक सूखी, पथरीली नदी के किनारे आमने-सामने खड़े थे।
“जौहर, तुम इतनी मगरूर और ज़िद्दी क्यों हो!” विक्रम ने गुस्से में लाल होकर चिल्लाया, “तुम्हारी यह अना पूरे गिरोह को मौत के कुएँ में ढकेल रही है! पुलिस चारों तरफ़ नाकाबंदी कर चुकी है!”
“मुझे मशविरा देने की ज़रा भी जरूरत नहीं है, विक्रम!” जौहर की आँखों में अंगारे दहक रहे थे, “मैं इस चंबल की बेटी हूँ। मैं अपनी हिफाज़त और अपने फैसले खुद करना…”
जौहर का जुमला अभी मुकम्मल भी नहीं हुआ था कि अचानक नदी के उस पार की ऊँची पहाड़ियों से अंधाधुंध गोलियों की बौछार,होने लगी। गोलियों की तड़तड़ाहट से आसमान गूंज उठा। यह पुलिस का हमला नहीं था, क्योंकि गोलियों की रफ़्तार और उनके चलने का क़ातिलाना अंदाज़ बिल्कुल जुदा था।
“नीचे झुको, जौहर!” विक्रम ने चिल्लाकर जौहर को एक भारी पत्थर के पीछे खींचा।
तभी कड़कती बिजली जैसी एक भारी, रोबीली और करारी आवाज घाटियों को चीरती हुई गूंजी,
“लड़ते रहो… आपस में ही लड़कर भेड़-बकरियों की तरह मर जाओ! विक्रम, तू जिस जौहर को अपनी ढाल और अपनी ताक़त समझता है, वो कालिया की अमानत है। आज सिर्फ़ डराने आया हूँ, अगली बार सीधे बारात लेकर आऊंगा और डोली की जगह तुम्हारी लाशें उठेंगी!
पल भर में गोलियां थम गईं। जब विक्रम के वफ़ादार साथी हथियारों के साथ दौड़ते हुए उस पहाड़ी पर पहुंचे, तो वहाँ सिवाय ख़ाली सन्नाटे के कुछ नहीं था। हाँ, ज़मीन पर कालिया के अरबी घोड़ों के ताज़ा खुरों के निशान थे। वह फ़िर आया, दोनों के बीच नफ़रत की चिंगारी को शोलों में तब्दील कर गया, और हवा हो गया। अब विक्रम और जौहर के दरमियान एक अनजाना, गहरा ख़ौफ़ रेंगने लगा था।
कहानी अब अपने उस मुकाम पर पहुंच चुकी थी जहाँ मौत अपना खेल दिखाने वाली थी। चंबल के एक तंग रास्ते पर जब भारी पुलिस बल ने विक्रम के गिरोह को चारों तरफ़ से घेरा, तो वह कोई इत्तेफ़ाक़ या पुलिस की मुस्तैदी नहीं थी। वह कालिया की बिछाई हुई सबसे बड़ी और आख़िरी शतरंज की चाल थी। उसने ख़ुद अपने मुख़बिरों के ज़रिये पुलिस को विक्रम के ठिकाने की पल-पल की खबर दी थी, ताकि कानून विक्रम का काम तमाम कर दे और वह बिना किसी रुकावट के जौहर को अपनी रखैल या रानी बना सके।
बीहड़ में ऐसा घमासान युद्ध छिड़ा जो चंबल के इतिहास में कभी नहीं देखा गया था। दोनों तरफ से बंदूकें अंधाधुंध आग उगल रही थीं। पुलिस के चक्रव्यूह में विक्रम का वफ़ादार घोड़ा गोली लगने से तड़पकर गिर चुका था। विक्रम ख़ुद भी बुरी तरह ज़ख़्मी था और उसके पैर से खून का फ़व्वारा छूट रहा था।
जौहर ने अदम्य साहस का परिचय दिया। उसने अपनी जान की परवाह न करते हुए, पुलिस की गोलियों की बौछार के बीच अपने घोड़े को आगे बढ़ाया और झुककर ज़ख़्मी विक्रम को एक ही झटके में घोड़े पर अपने पीछे खींच लिया।
वे अपनी जान बचाकर जैसे ही चंबल की उस मशहूर और खौफ़नाक गहरी खाई की तरफ़ बढ़े, अचानक सामने की घनी और कँटीली झाड़ियों को चीरता हुआ एक लंबा, चौड़ा और डरावना साया आकर खड़ा हो गया।
वह खुद ‘कालिया’ था!
कंधे पर कारतूसों की पेटी, चेहरे पर एक खौफ़नाक स्कार (निशान) और हाथ में मौत उगलती दोनाली बंदूक। उसकी आँखें वहशियत, हवस और पागलपन से चमक रही थीं। उसने अपनी बंदूक सीधे जौहर के सीने पर तान दी और अट्टहास करते हुए चिल्लाया।
“जौहर! रुक जा! आगे बढ़ेगी तो हज़ार फीट गहरी खाई है, पीछे मुड़ेगी तो पुलिस की मौत है। इस अधमरे, हारे हुए बाग़ी का साथ छोड़ दे! उस गुफा वाली रात को भूल जा, विक्रम के पास तुझे देने के लिए सिर्फ कफ़न है। मेरी बात मान, मेरे इस काले घोड़े पर बैठ जा… ख़ुदा की क़सम, इस पूरी चंबल की हुकूमत तेरे कदमों में डाल दूँगा!”
विक्रम ने तड़पते हुए, ज़ख़्मी हालत में भी अपनी बंदूक कालिया की तरफ तानी और ट्रिगर दबाया।’क्लिक’… लेकिन उसकी बंदूक ख़ाली हो चुकी थी। कालिया जोर से हँसा, “तेरी क़िस्मत और वक़्त दोनों ख़त्म हो चुके हैं, विक्रम!”
जौहर ने एक पल कालिया की तरफ देखा। उसकी आँखों में डर की एक शिकन तक नहीं थी, बल्कि नफ़रत का एक खौलता हुआ लावा था। उसने अपने वफ़ादार घोड़े की लगाम को पूरी ताक़त से हाथों में कसा, विक्रम को कसकर अपनी पीठ से सटाया और कड़कती आवाज़ में बोली “कालिया! तू चंबल का वो घिनौना कीड़ा है जो हमेशा अंधेरे की ओट में पीठ पीछे वार करता है। कान खोलकर सुन, उस गुफा वाली रात को जो दिल का मामला शुरू हुआ था, वो इस जन्म में तो क्या सात जन्मों में नहीं बदलेगा। इस शेर विक्रम के साथ मर जाना, तेरे जैसे कायर और भेड़िये के साथ जीने से हजार गुना बेहतर और मुकद्दर की बात है!
इससे पहले कि कालिया का दिमाग कुछ समझ पाता या उसकी उंगली बंदूक के ट्रिगर को दबा पाती, जौहर ने अपने घोड़े के पेट पर पूरी ताक़त से एड़ (लात) लगाई।
घोड़ा अपनी पूरी ताकत से हिनहिनाया और उसने धरती छोड़ दी। वह हवा में उछला… एक ऐसी छलांग, जिसने ज़मीन और आसमान के फ़ासले को मिटा दिया।
कालिया के हलक से एक गगनभेदी चीख निकली, “नहीं..
वह पागलों की तरह भागकर खाई के आख़िरी मुहाने तक पहुँचा, मगर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। कालिया की आँखें फटी की फटी रह गईं। विक्रम और जौहर एक-दूसरे को थामे, हवा में तैरते हुए, गहरी और अनंत वादियों के आग़ोश में समा रहे थे। उनके चेहरों पर मौत का डर नहीं, बल्कि एक-दूसरे को पा लेने का सुकून था।
कालिया ने गुस्से और हताशा में अपनी कीमती दोनाली बंदूक को ज़मीन के पत्थरों पर पटक दिया और पागलों की तरह चीखने लगा। बीहड़ की हवाओं ने उसकी चीख को सोख लिया। वह फिर से अकेला, नाकाम और ज़लील रह गया था। उसका वहम, उसका गुरूर और उसकी हवस हमेशा-हमेशा के लिए चंबल की इसी लाल मिट्टी में दफ़न हो चुकी थी।
चंबल की गवाही में… मौत हार चुकी थी और पहली नज़र की वो तक़रार जो गुफ़ा की रात मोहब्बत में बदली थी, आज अमर हो चुकी थी।
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़
