पर्यावरण दिवस: सिर्फ पेड़ लगा देना काफी नहीं, उनकी देखरेख भी जरूरी है
हर वर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस अवसर पर देशभर में लाखों पौधे लगाए जाते हैं। सरकारी विभाग, शैक्षणिक संस्थान, सामाजिक संगठन, निजी कंपनियां और आम नागरिक पर्यावरण संरक्षण के नाम पर पौधारोपण कार्यक्रम आयोजित करते हैं। समाचार पत्रों और सोशल मीडिया पर पौधे लगाते हुए लोगों की तस्वीरें दिखाई देती हैं। कई स्थानों पर बड़े-बड़े अभियान चलाए जाते हैं और हजारों पौधे एक ही दिन में लगाने का दावा किया जाता है। यह सब देखकर लगता है कि पर्यावरण संरक्षण के प्रति समाज में जागरूकता बढ़ रही है। लेकिन एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि जो पौधे आज लगाए जा रहे हैं, उनमें से कितने अगले वर्ष तक जीवित रहेंगे?
वास्तविकता यह है कि हमारे यहां पौधे लगाने पर जितना ध्यान दिया जाता है, उनकी देखभाल पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता। अक्सर पौधारोपण कार्यक्रम एक औपचारिकता बनकर रह जाते हैं। पौधे लगाए जाते हैं, फोटो खिंचवाई जाती हैं, समाचार प्रकाशित होते हैं और फिर उन पौधों को उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है। कुछ दिनों बाद पानी के अभाव में, पशुओं के कारण या उचित देखभाल न मिलने से वे पौधे सूख जाते हैं। परिणाम यह होता है कि पर्यावरण संरक्षण के नाम पर किया गया पूरा प्रयास केवल कागजों और तस्वीरों तक सीमित रह जाता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम पौधारोपण की संख्या गिनने के बजाय पौधों के जीवित रहने की संख्या पर ध्यान दें। एक जीवित वृक्ष हजार सूखे पौधों से अधिक मूल्यवान होता है। यदि लगाया गया पौधा कुछ ही महीनों में नष्ट हो जाए तो उसका पर्यावरण को कोई लाभ नहीं मिल पाता। इसलिए पर्यावरण दिवस का वास्तविक उद्देश्य केवल पौधे लगाना नहीं, बल्कि उन्हें वृक्ष बनने तक सुरक्षित रखना होना चाहिए।
हमारे समाज में एक प्रवृत्ति देखने को मिलती है कि किसी अभियान की सफलता को केवल संख्या के आधार पर मापा जाता है। यदि किसी संस्था ने दस हजार पौधे लगाए तो उसे बड़ी उपलब्धि माना जाता है, लेकिन यह जानने का प्रयास बहुत कम किया जाता है कि उन दस हजार पौधों में से कितने जीवित हैं। कई बार आंकड़ों की होड़ में गुणवत्ता की उपेक्षा हो जाती है। पौधे लगाने के बाद उनकी सिंचाई, सुरक्षा और नियमित निगरानी की व्यवस्था नहीं की जाती। परिणामस्वरूप अधिकांश पौधे कुछ ही समय में समाप्त हो जाते हैं।
किसी भी पौधे को वृक्ष बनने में वर्षों का समय लगता है। पौधारोपण केवल पहला कदम है। उसके बाद लगातार देखभाल की आवश्यकता होती है। जैसे एक नवजात शिशु को बड़ा करने के लिए माता-पिता को वर्षों तक देखभाल करनी पड़ती है, उसी प्रकार एक पौधे को भी वृक्ष बनने तक संरक्षण की आवश्यकता होती है। यदि शुरुआती वर्षों में उचित देखभाल न मिले तो उसका जीवित रहना कठिन हो जाता है।
गर्मी के मौसम में पौधों को नियमित पानी की आवश्यकता होती है। विशेष रूप से नए लगाए गए पौधे जल की कमी को सहन नहीं कर पाते। अनेक बार पौधारोपण तो वर्षा ऋतु में कर दिया जाता है, लेकिन वर्षा समाप्त होने के बाद उनकी सिंचाई की कोई व्यवस्था नहीं रहती। कुछ ही महीनों में पौधे सूख जाते हैं। यह स्थिति देश के अनेक हिस्सों में देखने को मिलती है। यदि पौधे को समय पर पानी मिल जाए तो उसके जीवित रहने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।
पौधों की सुरक्षा भी उतनी ही आवश्यक है। ग्रामीण क्षेत्रों में अक्सर पशु खुले घूमते रहते हैं। यदि पौधों के चारों ओर सुरक्षा घेरा न लगाया जाए तो पशु उन्हें नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसी प्रकार शहरी क्षेत्रों में भी कई बार लापरवाही या निर्माण कार्यों के कारण पौधे नष्ट हो जाते हैं। इसलिए पौधारोपण के साथ-साथ उनकी सुरक्षा की व्यवस्था करना भी अनिवार्य है।
एक और समस्या यह है कि कई बार ऐसे पौधे लगाए जाते हैं जो उस क्षेत्र की जलवायु और मिट्टी के अनुकूल नहीं होते। परिणामस्वरूप उनकी वृद्धि रुक जाती है या वे जल्दी नष्ट हो जाते हैं। पौधारोपण से पहले स्थानीय परिस्थितियों का अध्ययन करना चाहिए और ऐसे पौधों का चयन करना चाहिए जो उस क्षेत्र में आसानी से विकसित हो सकें। स्थानीय प्रजातियों के पौधे सामान्यतः अधिक सफल रहते हैं क्योंकि वे वहां के प्राकृतिक वातावरण के अनुरूप होते हैं।
पर्यावरण दिवस के अवसर पर यह भी आवश्यक है कि हम पौधारोपण को एक दिन का कार्यक्रम न मानें। इसे वर्षभर चलने वाले अभियान का रूप देना चाहिए। प्रत्येक लगाए गए पौधे की जिम्मेदारी किसी व्यक्ति, संस्था या समूह को दी जानी चाहिए। नियमित अंतराल पर उनकी स्थिति की समीक्षा की जानी चाहिए। यदि कोई पौधा सूख जाए तो उसके स्थान पर नया पौधा लगाया जाना चाहिए। इस प्रकार सतत प्रयासों से ही वास्तविक सफलता प्राप्त की जा सकती है।
विद्यालयों और महाविद्यालयों की भूमिका इस दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण हो सकती है। यदि प्रत्येक विद्यार्थी एक पौधे की जिम्मेदारी ले और उसकी देखभाल करे, तो पौधारोपण अभियान अधिक प्रभावी बन सकता है। इससे बच्चों में प्रकृति के प्रति प्रेम और जिम्मेदारी की भावना भी विकसित होगी। केवल भाषणों से पर्यावरण संरक्षण की भावना विकसित नहीं होती, बल्कि व्यवहारिक अनुभवों से होती है।
सामाजिक संगठनों को भी पौधे लगाने के साथ-साथ उनकी निगरानी की व्यवस्था करनी चाहिए। कई संस्थाएं हर वर्ष हजारों पौधे लगाने का दावा करती हैं, लेकिन उनके जीवित रहने का कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होता। यदि प्रत्येक संस्था अपने लगाए गए पौधों का वार्षिक मूल्यांकन करे और जीवित पौधों की संख्या सार्वजनिक करे, तो अभियान की विश्वसनीयता और प्रभावशीलता दोनों बढ़ सकती हैं।
सरकारी स्तर पर भी पौधारोपण कार्यक्रमों में सुधार की आवश्यकता है। केवल पौधे लगाने के लक्ष्य निर्धारित करने के बजाय उनके संरक्षण और जीवित रहने के लक्ष्य भी तय किए जाने चाहिए। संबंधित विभागों को नियमित निरीक्षण करना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि लगाए गए पौधों को आवश्यक देखभाल मिल रही है। यदि पौधारोपण अभियान का मूल्यांकन जीवित वृक्षों के आधार पर किया जाए तो परिणाम अधिक सकारात्मक हो सकते हैं।
आज पर्यावरण जिस संकट से गुजर रहा है, उसे देखते हुए प्रत्येक वृक्ष का महत्व बढ़ गया है। एक परिपक्व वृक्ष केवल छाया ही नहीं देता, बल्कि वह वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करके ऑक्सीजन प्रदान करता है, भूजल संरक्षण में सहायता करता है, मिट्टी के कटाव को रोकता है और अनेक पक्षियों तथा जीवों को आश्रय देता है। इसलिए जब कोई पौधा उचित देखभाल के अभाव में सूख जाता है, तो केवल एक पौधा नहीं मरता, बल्कि पर्यावरण को मिलने वाले अनेक संभावित लाभ भी समाप्त हो जाते हैं।
वास्तविक पर्यावरण संरक्षण का अर्थ केवल वृक्षारोपण नहीं, बल्कि वृक्ष संवर्धन है। हमें पौधे लगाने की संस्कृति के साथ-साथ पौधे बचाने की संस्कृति भी विकसित करनी होगी। जिस दिन समाज यह समझ जाएगा कि एक पौधे की देखभाल करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना उसे लगाना, उसी दिन पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों को नई दिशा मिलेगी।
पर्यावरण दिवस हमें यह सोचने का अवसर देता है कि क्या हम केवल प्रतीकात्मक गतिविधियों तक सीमित रहना चाहते हैं या वास्तव में प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाना चाहते हैं। यदि हमारा उद्देश्य केवल फोटो खिंचवाना या समाचारों में स्थान प्राप्त करना है, तो पौधारोपण का कोई विशेष अर्थ नहीं रह जाता। लेकिन यदि हमारा उद्देश्य पृथ्वी को हरित और सुरक्षित बनाना है, तो हमें लगाए गए प्रत्येक पौधे को वृक्ष बनने तक संरक्षण देना होगा।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम पौधारोपण की सफलता को लगाए गए पौधों की संख्या से नहीं, बल्कि जीवित और विकसित हो रहे वृक्षों की संख्या से मापें। पर्यावरण दिवस के अवसर पर लिया गया सबसे बड़ा संकल्प यही होना चाहिए कि हम केवल पौधे नहीं लगाएंगे, बल्कि उनकी नियमित देखभाल भी करेंगे। उन्हें पानी देंगे, उनकी सुरक्षा करेंगे और उनके विकास पर नजर रखेंगे।
जब एक पौधा वृक्ष बनता है, तभी पर्यावरण दिवस का उद्देश्य पूरा होता है। तभी प्रकृति को वास्तविक लाभ मिलता है। तभी आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ हवा, हरियाली और स्वस्थ पर्यावरण का उपहार मिल सकता है। इसलिए यह समय पौधे लगाने की होड़ से आगे बढ़कर पौधे बचाने के अभियान को प्राथमिकता देने का है। यदि हम ऐसा कर सके, तो पर्यावरण दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं रहेगा, बल्कि धरती को बचाने का सशक्त जनआंदोलन बन जाएगा। यही इस दिवस की वास्तविक सफलता होगी और यही प्रकृति के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि भी होगी।
— डॉ. शैलेश शुक्ला
