गीत/नवगीत

जून तुम आए हो

व्याकुल मन को बॅंधाते धैर्य सावन की फरियाद लिए,
जून तुम आए हो आशाओं का नव “आनंद” राग लिए ।

बीतेगी गर्मी की तपिश और थमेंगी आग उगलती लू,
आएगा मानसून उम्मीद जगाकर ये दर्द थोड़ा सहलूॅं,
बूझेगी प्यास मिटेगी ये तड़प किसान करते हैं चर्चा,
परिंदा भी धीर धार करें प्रतिक्षा देखें नभ को ललचा,
बंजर पड़े खेतों में हरियाली का शुभादि वरदान लिए ।

सुख-दुख से भरा जीवन मन चाहता सदा रहना यौवन,
परिवर्तन प्रकृति का नियम दुःख छंटेगा आएगा सावन,
सब कर रहे हैं इंतजार ईश्वर पर रखकर अटूट विश्वास,
रिमझिम करती बारिश की बूॅंदे और सुख का एहसास,
श्रमस्वेद की प्रतिध्वनि का फल संग प्राणों का गान लिए ।

चाहतों का जल सपनों के सागर से मिलने का इच्छुक,
उम्मीद उल्लास की किरणें मन को कर देती हैं भावुक,
मन में होती जब मीठी दस्तक किसी अपने के आने की,
हर दुख मिट जाता घड़ियॉं वजह ढूॅंढती हैं मुस्कानें की,
मन के ऑंगन में इंद्रधनुषी खुशियों का आसमान लिए ।

व्याकुल मन को बॅंधाते धैर्य सावन की फरियाद लिए,
जून तुम आए हो आशाओं का नव “आनंद” राग लिए ।

— मोनिका डागा “आनंद”

*मोनिका डागा 'आनंद'

चेन्नई, तमिलनाडु

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