विद्या-दोहे
चलन बहू का क्या कहूं, फूटी है तकदीर।
घर में मुझको मिल गई, बेढंगी तस्वीर।।१.
घूंघट में थी सादगी, उसे बताएं कौन।
स्वतंत्रता के नाम पर, घर के बूढ़े मौन।।२.
आंख मूंद खाते रहे, दाल भात में बाल।
कहे! लोभी दहेज के, घर में मचा बवाल।।३.
ठोकर थाली मारकर, देती है पकवान।
कोंस रही है खांसते, बूढ़े से भगवान।।४.
फ़ैशन के इस दौर में, सुन बेटी के बाप।
पालन ऐसा कीजिए, बड़े न घर में पाप।।५.
घर की लक्ष्मी बन गई, रण चंडी सा गात।
चलन अनोखा आ गया, बन बैठी है तात।।६.
मिले सुदामा कृष्ण से, “गजानंद”अरदास।
चीर चुराया मत करो, गोपी बहुत उदास।।७.
— गजानंद डिगोनिया ‘जिज्ञासु’
