सामाजिक

व्हाट्सएप से पहले की दुनिया

व्हाट्सएप से पहले की दुनिया में संदेश तो देर से पहुँचते थे, पर भावनाएँ नहीं। तब रिश्ते नेटवर्क की गति से नहीं, हृदय की निकटता से चलते थे।

मुझे आज भी याद है—दोपहर की धूप में जब डाकिए की साइकिल की घंटी गली में गूँजती थी, तो मन अनायास ही दरवाज़े की ओर दौड़ पड़ता था। किसी प्रियजन का पत्र मिलना मानो सूखे मन पर सावन की पहली फुहार जैसा लगता था। उस कागज़ पर लिखे शब्द केवल अक्षर नहीं होते थे, वे स्नेह की धड़कनें होते थे। पत्र को एक बार नहीं, कई-कई बार पढ़ा जाता था; हर पंक्ति में किसी अपने की आवाज़ सुनाई देती थी।

उस दौर में “ऑनलाइन” होने से अधिक महत्वपूर्ण “अपनेपन” का होना था। बातचीत के लिए घंटों स्क्रीन नहीं, कुछ सच्चे पल पर्याप्त होते थे। रिश्तों में प्रतीक्षा थी, और उसी प्रतीक्षा में प्रेम की मिठास घुली रहती थी।

कभी-कभी लगता है कि उस समय घड़ियों की सुइयाँ भी आज की तुलना में कुछ धीमी चलती थीं। लोगों के पास समय कम नहीं, बल्कि एक-दूसरे के लिए समय होता था। गर्मियों की शामों में छत पर बिछी चारपाइयों पर बैठकर परिवार के साथ बातें करना, दादी-नानी की कहानियाँ सुनना, मोहल्ले के बच्चों के साथ देर तक खेलना और फिर रात को तारों भरे आकाश को निहारना—यही तो जीवन का सबसे सुंदर “स्टेटस अपडेट” हुआ करता था।

मुझे आज भी याद है कि जब किसी रिश्तेदार के घर से अचानक कोई अतिथि आ जाता था, तो घर का वातावरण ही बदल जाता था। स्वागत में बिछी मुस्कानें किसी इमोजी की मोहताज नहीं थीं। हालचाल पूछने के लिए संदेश नहीं, लोग स्वयं चलकर आ जाया करते थे। रिश्ते मोबाइल की मेमोरी में नहीं, दिलों की तहों में सुरक्षित रहते थे।

आज जब तकनीक ने पूरी दुनिया को हमारी हथेली में समेट दिया है, तब एक विचित्र विडंबना भी हमारे सामने खड़ी है। एक ही घर में रहने वाले चार लोगों की अपनी-अपनी अलग दुनिया है। कोई मोबाइल स्क्रीन में डूबा है, कोई सोशल मीडिया पर व्यस्त है, कोई वीडियो देखने में खोया है और कोई चैटिंग में। सब एक साथ होकर भी कहीं न कहीं एक-दूसरे से दूर होते जा रहे हैं। संवाद कम हो रहे हैं, साझा हँसी कम हो रही है और मन की बातें भीतर ही भीतर सिमटती जा रही हैं। यह स्थिति अनजाने में ही आपसी रिश्तों की उस मजबूत नींव को कमजोर कर रही है, जो कभी साथ बैठने, सुनने और समझने से बनती थी।

आज व्हाट्सएप पर संदेश पलक झपकते पहुँच जाते हैं, पर कभी-कभी लगता है कि उस तेज़ी में वह ठहराव खो गया है, जिसमें भावनाएँ साँस लेती थीं। तब शब्द कम होते थे, पर अर्थ गहरे; साधन सीमित थे, पर संबंध असीम।

शायद इसी कारण उस दौर की याद आते ही मन के किसी कोने में एक मधुर कसक जाग उठती है। तकनीक ने जीवन को आसान अवश्य बनाया है, पर उन दिनों की सहजता, अपनापन और प्रतीक्षा का सौंदर्य आज भी स्मृतियों के आँगन में दीपक की लौ की तरह टिमटिमाता रहता है।

आज व्हाट्सएप की दुनिया में संदेशों की रफ्तार प्रकाश से भी तेज़ प्रतीत होती है, पर कभी-कभी मन उस युग की चौखट पर जाकर ठहर जाता है, जहाँ संवादों में जल्दबाज़ी नहीं, अपनत्व की गरमाहट होती थी। तब लोग “ऑनलाइन” कम और एक-दूसरे के जीवन में अधिक उपस्थित रहते थे। शायद इसलिए उस दौर की स्मृतियाँ आज भी मन के आकाश में किसी ध्रुव तारे की तरह चमकती हैं।

समय बदल गया, साधन बदल गए, संवाद के तरीके बदल गए, पर मन आज भी कभी-कभी उस दुनिया को खोजता है जहाँ एक चिट्ठी में पूरा स्नेह समा जाता था, एक मुलाकात महीनों की दूरी मिटा देती थी और रिश्ते किसी नेटवर्क के नहीं, विश्वास के सहारे चलते थे।

व्हाट्सएप से पहले की दुनिया शायद तकनीक में पीछे थी, किंतु संवेदनाओं में बहुत आगे। वह दुनिया हमें सिखाती है कि संदेशों की गति नहीं, उनमें बसने वाला स्नेह ही संवाद को जीवंत बनाता है। आज भी पुराने पत्रों की पीली पड़ चुकी पत्तियाँ यह कहती प्रतीत होती हैं
“रिश्ते इंटरनेट से नहीं, इंतज़ार से गहरे होते हैं।”

— डॉ. सारिका ठाकुर ‘जागृति’

डॉ. सारिका ठाकुर "जागृति"

ग्वालियर (म.प्र)

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