जले हुए घर की पीड़ा
जलकर खाक मकान है, रोए हर दीवार।
माफ़ी से कब जुड़ सके, टूटा अब संसार॥
चूल्हे, चौखट, छत जली, जले सभी अरमान।
माफ़ी से कब लौटते, बीते हुए जहान॥
राख हुई तस्वीर सब, बिखरे सपने-हार।
आग भले पछता रही, कौन मिटाए भार॥
जलते घर की पीर को, समझे वह इंसान।
जिसने खोया आग में, अपना सुख-सम्मान॥
माफ़ी माँगे आग यदि, फिर भी रहे मलाल।
यादों के अवशेष का, कौन करे प्रतिपाल॥
घर तो फिर से बन उठे, ईंट लगेगी चार।
लेकिन खोया प्यार फिर, मिलता नहीं उधार॥
आँसू से सींचे गए, जीवन भर के कल्प।
एक चिंगारी खा गई, वर्षों का संकल्प॥
राख हुई उम्मीद जब, टूटा मन का धैर्य।
माफ़ी का मरहम नहीं, ला सकता ऐश्वर्य॥
जलकर काला हो गया, यादों का इतिहास।
आग भले शर्मिंदा हो, लौटे ना विश्वास॥
आग कहे अब भूल थी, जला-जला विश्वास।
राख तले दबकर पड़े, जीवन के अहसास॥
— डॉ. सत्यवान ‘सौरभ’
