महँगाई की आग
गैस, पेट्रोल, डीज़ल के दाम,
हर दिन लिखते नए पैगाम।
जेब हो रहीं और भी हल्की,
जीवन में छा रहीं हैं कड़की।
पहियों की रफ्तार महँगी है,
सफर की हर डगर ठहरी है।
खेतों से लेकर बाजारों तक,
वस्तु का मूल्य असहनीय है।
यूं मज़दूर की मेहनत रोती है,
गृहिणी भी चिंता में सोती है।
अब रसोई में चूल्हा पूछ रहा,
कब राहत की कोई ज्योति है?
जब भी ईंधन के भाव बढ़ेंगे,
हरेक सामान भी महँगे होंगे।
हाँ, महंगाई के इस तूफान में
सपनों के दीपक भी डोलेंगे।
शासकों का ‘धर्म’ यही होता,
जनजीवन को सरल बनाना।
इन कीमतों पे संयम रखकर,
हर चेहरे को ‘सुख’ पहुँचाना।
हम-तुम मिलकर स्वर उठाएँ,
जनहित की यूं बात बतलाएँ।
ऐसी नीतियाँ बने हिंदुस्तान में,
जिससे होठों पे मुस्कान पाएँ।
— संजय एम तराणेकर
