पापा के कंधों पर
पापा के कंधों चढ़ा,
नन्हा देखे गाँव।
छोटी-सी मुस्कान में,
बसता सारा ठाँव॥
आँखों में उत्साह है,
मन में नूतन ज्ञान।
पेड़ों-पंछी से करे,
हर पल नव पहचान॥
ऊँचा बैठा बाल मन,
छूता नभ के छोर।
सपनों की पतवार ले,
बढ़ता जाता जोर॥
पापा जैसे वृक्ष हैं,
देते शीतल छाँव।
उनके सँग हर राह पर,
खुशियों वाला गाँव॥
नन्हे को विश्वास है,
पापा हैं आधार।
उनके कंधों पर दिखे,
सारा जग साकार॥
हँसता-खेलता बालपन,
प्रेम भरा संसार।
पिता-पुत्र का नेह यह,
जीवन का श्रृंगार॥
— डॉ. सत्यवान सौरभ
