गीत/नवगीत

पैसा बोलता है

हां यह सच है कि पैसा बोलता है
राजदारों का भी मुंह खोलता है
इसको देखकर बड़ों- बड़ों का
सहज ही ईमान डोलता है
हां यह सच है कि पैसा बोलता है ।।

पैसे की गर्मी जब किसी को
कुछ ज्यादा ही चढ़ जाती है
छूट जाते फिर सारे संस्कार धीरे-धीरे
बस मैं मैं की भावना घर कर जाती है

देखता फिर हर चीज में लाभ -हानि
साथ ही भूलकर सारी आत्मग्लानि
स्वार्थ के तराजू में सबको तौलता है
हां यह सच है कि पैसा बोलता है।।

जब कोई अधर्म मार्ग पर चल पड़ता
हर छोटी -बड़ी बात पर फिर लड़ता
स्वयं की त्रुटि दिखाई न पड़ती
धन के रौब में व्यर्थ ही अकड़ता ।

तोड़ देता स्वयं वह सारे रिश्ते नाते
उसको तो बस फिर चापलूस ही भाते
जीवन भर स्वार्थ के पीछे दौड़ता है
हां यह सच है कि पैसा बोलता है।।

अपने को फिर वह सर्वस्व समझता
तर्क संगत बात को नजरंदाज करता
धीरे-धीरे होता पतन की ओर अग्रसर
और स्वयं फिर कुल्हाड़ी पर पैर धरता

जब तक सम्भले बहुत देर हो जाती
फिर तो बस पीटता रह जाता छाती
थक हारकर अपना सर फोड़ता है
हां यह सच है कि पैसा बोलता है।।

धनी होकर भी जो विनम्रता से भरे हैं
करुणा, प्रेम, स्नेह जन-जन से करें हैं
ऐसे लोग सबके ह्रदय को भाते
जाने के बाद भी यादों में रह जाते ।

सहज ही बन जाते वो सबके आदर्श
और याद करते उनके दिये परामर्श
अक्सर उनको मेरा दिल टटोलता है
हां यह सच है कि पैसा बोलता है ।।

पैसे की महत्ता को भला कौन नकारे
इसके प्रभाव को हर कोई स्वीकारे
जब मेहनत की कमाई घर आती
तब उल्लास व आनंद हिलोरे मारे

बरसता घर में भरपूर सुख चैन
चाहे दिन हो या फिर हो रैन
विपरीत हवाओं का रुख मोड़ता है
हां यह सच है कि पैसा बोलता है ।।

इसको देखकर बड़ों-बड़ों का
सहज ही ईमान डोलता है
हां यह सच है कि पैसा बोलता है
हां यह सच है कि पैसा बोलता है।।

— नवल अग्रवाल

*नवल किशोर अग्रवाल

इलाहाबाद बैंक से अवकाश प्राप्त पलावा, मुम्बई

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