अनजान शहर में
अनजान ‘शहर’ की गलियों में,
मैं खुद को ढूँढता फिर रहा हूँ।
हरेक चेहरा लगता अपना-सा,
फिर भी ‘तन्हा-तन्हा’ रहता हूँ।
यहाँ पर हवाओं का ‘रंग’ नया,
सपनों की भाषा भी हैं अलग।
शोर-भीड़ बहुत है राहों में पर,
दिल को मिलता नहीं ‘मलंग’।
ये ऊँची इमारतें, चमकती रातें,
शोर यहाँ हर पल गाते रहता है।
गाँव की मिट्टी की सौंधी खुशबू,
मन को अक्सर बुलाते रहती है।
हम ‘कदम’ बढ़ाये जाते हैं फिर,
एक नई सुबह की ‘आस’ लिए।
अनजान शहर भी ‘अपना’ लगे,
यह अपनेपन-सा एहसास लिए।
— संजय एम तराणेकर
