लघु कथा – भावना
मनुष्य एक भावना प्रधान प्राणी है उसकी भावनाएं ही उसके सुख दुख की साथी होती हैं,स्थिति प्रतिकूल हो तो दुख होता है और अनुकूल हो जाए भावनाओं के तो उसे बहुत खुशी मिलती है।
आठवीं क्लास में पढ़ने वाला एक होनहार विद्यार्थी स्कूल से वापस आते समय बहुत खुश था वह खुशी-खुशी घर पहुंचा और पापा पापा करते हुए घर के अंदर घुसा, उसके पापा पीछे कमरे में अपना कोई ऑफिस का काम कर रहे थे, तुरंत उनके पास गया , बड़ी खुशी से उनके पांव छूकर बोला, पापा आज तो मजा आ गया, हमारे स्कूल का दूसरे वाले स्कूल के साथ क्रिकेट मैच था, हमने वह मैच जीत लिया और पापा मैंने 100 रन बनाए और चार विकेट भी लिए ,
मुझे मैन ऑफ द मैच अवार्ड भी मिला,पापा मजा आ गया।
इतना सुनकर पापा ने उसे तिरछी नजर से देखा और फिर एक जोर का तमाशा जड़ दिया, और चिल्ला कर बोले तो स्कूल पढ़ने जाता है या खेलने जाता है।
इसके बाद उसके दिल पर क्या बीती आप खुद समझ सकते हैं। बच्चा बहुत बहुत रोया , उसकी भावना को ठेस लग गई थी। अब ना तो उसकी पढ़ाई में मन लगता था ना खेल में,
धीरे-धीरे उसका प्रदर्शन हर जगह से खराब होने लगा स्कूल ने पहले उसको अपनी क्रिकेट टीम से निकाल दिया।
पढ़ाई में भी उसका मन पहले सा नहीं लगता था ,और वह बच्चा जो सदा कक्षा में प्रथम या द्वितीय स्थान पर रहता था, बड़ी मुश्किल से पास हुआ।
भगवान ना करें कभी किसी मासूम की भावनाओं को ऐसी ठेस पहुँचे और वह जिंदगी में सफलता की राह से फिसल कर असफलता की तरफ बढ़ता जाए।
— जय प्रकाश भाटिया
