दोहा
जिसने जब जब भी किया,गुरूओं का अपमान।
कभी नहीं वो पा सका,इस दुनिया में मान।।
अगर किसी चाणक्य का,हुआ कहीं अपमान।
नन्द वंश की ही तरह,छिनती है पहचान।।
धनानन्द को जब हुआ,पद का बहुत गुरूर।
विष्णु गुप्त ने कर दिया,उसे ताज से दूर।।
एक गुरू ने कर दिया,इक शासन का अन्त।
मिटा दिया कौटिल्य ने,एक बड़ा धनवन्त।।
— शालिनी शर्मा
