सामाजिक

निजता का बढ़ता चलन

आजकल टेलीविजन पर अक्सर एक विज्ञापन देखने को मिलता है यह विज्ञापन वर्तमान पीढ़ी की बदलती मानसिकता और हमारे पारिवारिक ढाँचे में आ रहे सूक्ष्म बदलावों का एक जीवंत चित्रण है। विज्ञापन में माँ को घर की साफ-सफाई और सजावट करते देख बिना कुछ पूछे बेटे का यह कहना, “मैं अपना कमरा किसी के साथ शेयर नहीं करूंगा,” सुनकर अजीब सा लगता है कि केवल माँ को साफ सफाई करते देख कैसे बच्चा यह बात मान लेता है कि मेहमान आयेंगे तो उसे उसका कमरा या तो छोड़ना पड़ेगा या किसी के साथ शेयर करना पड़ेगा। ऊपरी तौर पर ये एक साधारण संवाद लग सकता है, लेकिन गहराई से सोचा जाए तो इसके पीछे गहरे सामाजिक और मनोवैज्ञानिक अर्थ छिपे हैं। बाद में बच्चे का माँ के ऐसा बोलने पर जब माँ कारण पूछती है तब बच्चा बोलता है कि “कोई मेहमान आने वाला है न इसीलिए घर को साफ कर रही हो?” जिसे देखकर मन में कई प्रश्न उठते हैं।
बच्चे हो या बड़े आज के दौर में ‘पर्सनल स्पेस’ या निजी स्थान की अवधारणा बहुत प्रबल हो गई है। पुराने समय में जहाँ ‘साझाकरण’ को एक संस्कार माना जाता था, वहीं आज के बच्चे अपनी निजता को लेकर अधिक सतर्क हैं। यह विज्ञापन दर्शाता है कि आधुनिक परिवेश में बच्चों के लिए उनका कमरा मात्र सोने की जगह नहीं, बल्कि उनकी अपनी एक दुनिया है जहाँ वे अपनी शर्तों पर रहना चाहते हैं, जिसमें उन्हें किसी की दखलंदाज़ी बर्दाश्त नहीं।
भारतीय संस्कृति में ‘अतिथि देवो भव:’ का आदर्श सर्वोपरि रहा है। मेहमान के आने की आहट मात्र से घर में उत्साह का माहौल हो जाता था। लेकिन विज्ञापन का यह दृश्य आज के बदले हुए परिवेश की एक कड़वी सच्चाई को भी उजागर करता है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में अतिथि का आगमन कभी-कभी बच्चों के लिए ‘अपेक्षाकृत बोझ’ या उनकी दिनचर्या में ‘व्यवधान’ जैसा महसूस होने लगा है। जबकि आज से बीस-तीस वर्ष पूर्व तक बच्चे छुट्टियों का बेसब्री से इंतजार करते थे क्योंकि छुट्टियों का आगमन यानि दादी, नानी, मौसी आदि के घर जाने या उनके आने का एक तय कार्यक्रम माना जाता था जो अब पूर्णतया खत्म होता जा रहा है। विज्ञापन में छोटे बच्चे का मेहमान के आने के विचार को नकारते हुए अपनी असहमति जताना यह भी दिखाता है कि आज के परिवारों में औपचारिकता कम और अकेलापन, चीजों को दूसरों के साथ साझा यानि शेयर न करना आम बात बन गई है।
इस व्यवहार का एक बड़ा कारण है एकल परिवारों का बढ़ता चलन। जब बच्चा अकेले कमरे में रहने का आदी हो जाता है, तो उसे किसी दूसरे व्यक्ति के साथ सामंजस्य बिठाना चुनौतीपूर्ण लगने लगता है।
इसका नकारात्मक पक्ष ये है इससे कहीं न कहीं सहनशीलता और बांटने की भावना में कमी आती है। ऐसा नहीं कि सिर्फ बच्चे ही नहीं बल्कि बड़े भी इस परंपरा को अपनाए बैठे हैं। पहले शादी विवाहों मैं घर के कमरों में एक साथ सबके बिस्तर बिछा दिए जाते थे सब देर रात तक आपस में बैठकर बातें करते और हंसते खेलते थे परन्तु आज घर में भी सबको अपना अपना कमरा अलग चाहिए। आज विवाह आदि कार्यक्रमों में रिश्तेदार भी मेहमान बनकर केवल खाने की मेजों और रस्मों पर ही एकत्रित होते हैं वरना सब अपने अपने कमरों में घुसे रहते हैं।
यह विज्ञापन हमें सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम अपनी सुख-सुविधाओं के दायरे में इतने सिमट गए हैं कि रिश्तों की गर्माहट पीछे छूट रही है? सफाई केवल घर के कोनों की ही नहीं, बल्कि सोच की भी जरूरी है। आधुनिकता का अर्थ अपनी निजता को बचाना जरूर है, लेकिन यह अपनों से दूरी बनाने की कीमत पर नहीं होना चाहिए। घर केवल दीवारों और कमरों से नहीं, बल्कि एक-दूसरे के लिए जगह बनाने और खुशियाँ साझा करने से बनता है।
हमें अपने बच्चों को यह सिखाने की आवश्यकता है कि कमरा साझा करने से स्थान भले ही कम हो जाए, लेकिन रिश्तों में प्यार, लगाव और अपनापन यकीनन बना रहता है जो हमें एक दूसरे से जोड़ कर रखता है। रिश्तों को संजोकर रखना, यही हमारे देश की परंपरा है और खूबसूरती भी।

— नीता शर्मा

नीता शर्मा

शिलोंग, मेघालय

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