कुम्हार का चाक
रास्ते में जल्दी-जल्दी चलते हुए राकेश का पैर वहाँ पड़े एक पत्थर से टकराया।
“उफ़! यह पत्थर भी न। इसे भी यही जगह मिली थी पड़े रहने की”, वह झुँझलाकर बोला।
“तुम्हारे जैसा इंसान मुझे यहाँ फेंक गया। तुम देख कर नहीं चल सकते और मुझे ही दोष देते हो।”
“तुम्हें दोष न दूँ तो किस दूँ? एक तो मैं जल्दी में हूँ दूसरा तुम्हें तो दूसरों को चोट पहुँचा कर अच्छा लगता है।”
राकेश की बात सुनकर वह बोला, “मैं किसी को चोट नहीं पहुँचाता। यह तो तुम इंसानों की फितरत है। मुझे फेंकने वाले हाथ तुम्हारे ही होते हैं और चोट खाने वाले भी वे ही होते हैं।”
“अच्छा, पत्थर भी अब नसीहत देने लगे। क्या जमाना आ गया है मुझे तुमसे पूछना पड़ेगा कि मैं कैसे चलूँ,” राकेश ने व्यंग्य से कहा।
“मैं नसीहत नहीं दे रहा हूँ पर ध्यान से देखो मैं तुम्हारे चारों ओर हूँ।”
“वह कैसे?”
“जिस रास्ते पर तुम खड़े हो वह मुझसे ही बना है। इमारतें, फैक्ट्री, पुल आदि सभी में ही मेरा अंश है यहाँ तक की आस्था का केंद्र भी मैं ही हूँ। जहाँ सभी शीश झुकाते हैं।और बताऊँ..”
यह सुनकर एक पल के लिए राकेश की बोलती बंद हो गयी। उसने शान्त स्वर में कहा, “हाँ बोलो।”
“जब तुम लोग मुझे ठोकर मारते हो, मेरे ऊपर हथौड़ा-छेनी चलाते हो तो मुझे भी पीड़ा होती है पर मैं किसी से शिकायत नहीं करता। जानते हो क्यों?”
“क्यों?”
“मेरे शरीर का एक-एक कण विकास के काम आ रहा है – यह सोचकर मैं दर्द भूल जाता हूँ। तुम अपने बारे में सोचो।”
यह सुनकर राकेश ने अपनी दोनों हथेलियाँ को ध्यान से देखा और बोला, “सच.. निर्माण और विध्वंस..”
— डाॅ. अनीता पंडा ‘अन्वी’
