सिर्फ नाविक थे न?
समुद्री लहरों से लड़ते-लड़ते,
जीवन जिनका यूं बीत गया।
इस देश की साँसें चलती रहीं,
उनका नाम कहाँ पे खो गया।
वे सीमा पर “सैनिक” नहीं थे,
न ही पदकों के अधिकारी थे।
पर “सागर” की हर गहराई में,
वह तो भारत के पहरेदार थे।
यूं तूफानों से आँख मिलाकर,
जिन्होंने एक “राह” बनाई थी।
तेल, व्यापार और सपनों की,
नदियाँ हरेक घर तक लाई थीं।
ये माह-महीनों “घर” से दूर रहे,
अपनों की यादों में सँजोए हुए।
हर एक लहर पर विश्वास रखे,
स्व-कर्तव्यों की लौ जलाए हुए।
एक दिन अचानक “मौत” आई,
हमले का आवरण ओढ़ के गईं।
समुद्र की गोद में छिपके समाई,
दुनिया पूछे “वे सैनिक थे क्या?”
(संदर्भ – अमेरिकी हवाई हमले में तीन भारतीय नाविकों की मौत)
— संजय एम तराणेकर
