मुक्तक/दोहा

मुक्तक

मेरे हुनर की तारीफ़ करना सीख लो,
गर्दिश के दिनों में मुस्कुराना सीख लो।
अपनों पर जां निछावर करता ज़माना,
दुश्मनों से भी प्यार करना सीख लो।

क्या मेरा था खो गया जो, कभी सोचना,
ख़ाली हाथ आये खाली जाना, सोचना।
मैं और मेरे की हाय हाय, मरने नहीं देती,
मरते ही शमशान लाते अपने हैं, सोचना।

पंच तत्व से बनी काया, उसमें ही मिल जाती है,
जिस जहां से आयी आत्मा, वहीं लौट जाती है।
कर्म करना दायित्व अपना, सत्कर्म या दुष्कर्म,
जैसा कर्म किया हमने, परिणाम छोड़ जाती है।

है बहुत मुश्किल मगर, आभार जताना सीख लो,
मानव तन हमको मिला, उपकार करना सीख लो।
दया दान धर्म कर्म करना, सनातन की पहचान है,
सत्कर्म का मार्ग श्रेष्ठ, उस मार्ग चलना सीख लो।

— डॉ. अ. कीर्तिवर्द्धन

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