समय के दस्तावेज
शब्द कभी केवल शब्द नहीं होते,
वे समय के दस्तावेज होते हैं,
जो लिखे जाते हैं
सदियों की चुप्पियों के बीच,
और पढ़े जाते हैं
आने वाली पीढ़ियों के प्रश्नों में।
जो सहा गया,
यदि वह लिखा नहीं गया,
तो इतिहास अक्सर
झूठ के पक्ष में खड़ा दिखता है।
सच की पीड़ा
कागज़ पर उतरना चाहती है,
ताकि आने वाला समय जाने
कि हम केवल दर्शक नहीं थे।
कितनी बार देखा हमने
अधिकारों को बिकते हुए,
विचारों को झुकते हुए,
और सच को
सिक्कों के नीचे दबते हुए।
मगर हर दौर में
कुछ कलमें बची रहीं,
जो झुकी नहीं, बिकी नहीं,
बस समय के सामने
आईना बनकर खड़ी रहीं।
ये दस्तावेज बताते हैं
कि अन्याय नया नहीं होता,
बस चेहरे बदलते रहते हैं।
कभी जाति के नाम पर,
कभी धर्म के नाम पर,
कभी सत्ता के मद में डूबकर
मनुष्य मनुष्य को तोड़ता रहता है।
पर समय भी गवाह है—
हर अँधेरे के विरुद्ध
एक दीप अवश्य जला है,
हर चुप्पी के विरुद्ध
एक स्वर अवश्य उठा है।
और जब भी इतिहास ने करवट ली,
उन स्वरों ने ही
भविष्य का रास्ता गढ़ा है।
इसलिए लिखो,
कि तुम्हारे शब्द
केवल तुम्हारे न रहें,
वे बनें समाज की स्मृति,
संघर्ष की विरासत,
और आने वाले कल के लिए
समय के जीवित दस्तावेज।
— राजेन्द्र लाहिरी
