कविता

आवरण

कविताएँ महज शब्द नहीं, एक आवरण हैं,
परिधान है वो, जो ओढ़ती लेखनी है।
यह तो भावों का आचमन, एक समर्पण है,
इसे उघाड़ो मत, यह अंतर्मन की ध्वनि है।

कलेवर लगाकर पढ़ो इसे, बस विधा मानो,
कवि के निजी जीवन का इसे गवाह न जानो।
उन्हें महसूस करो, जिन्होंने इसे महसूसा है,
तभी तो यह सृजन समष्टि को समर्पित हुआ है।

माँ शारदे के आशीष से जो सुर मिला,
तभी तो कोरे पन्नों पर यह भाव खिला।
यह तूलिका महज स्याही का रूप नहीं,
यह तो बहता हुआ अस्थि-मज्जा-रक्त है।

इसी ने दामिनी की चीख को पन्नों पर उतारा,
यही किन्नर और वेश्या के दर्द का भक्त है।
कवि ने पात्र के हृदय को गहराई से जिया,
उसके दुखों को परिधान बनाकर खुद पहन लिया।

तड़प को महसूस कर जब भावों को पिरोया,
तब जाकर कहीं इन शब्दों ने आकार लिया।
समाज से ही तो शब्द और संवेदनाएँ पाईं,
फिर शब्दों का आवरण पहनाकर यह मूरत बनाई।

वह खुद हर दर्द की भुक्तभोगी नहीं होती,
संवेदना और वेदना के गहरे सागर में डूबकर,
आपकी ही अनकही, अनसुनी भावनाओं को,
उसकी कलम कागज़ पर मुकम्मल करती है।

आप भी इसे बस एक सुंदर आवरण बना लें,
इसे ओढ़कर, इसकी रूह को महसूस कर लें।
रचना का इस तरह निर्मम पोस्टमार्टम न करें,
कवि का मन दुखता है, रूह में सिहरन होती है!

— डॉ. सविता सिंह ‘मीरा’

*सविता सिंह 'मीरा'

जन्म तिथि -23 सितंबर शिक्षा- स्नातकोत्तर साहित्यिक गतिविधियां - विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित व्यवसाय - निजी संस्थान में कार्यरत झारखंड जमशेदपुर संपर्क संख्या - 9430776517 ई - मेल - meerajsr2309@gmail.com

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