हठकर बैठा गधा एक दिन
हठकर बैठा गधा एक दिन मम्मी से वह बोला
दिलवा दो मां मुझे एक पीएम का नया झिगोला
सन-सन चलते बाण मगर मैं कभी नहीं डरता हूं
सहम-सहमकर किसी तरह यात्रा पूरी करता हूं
सच-सच कहता हरदम लेकिन कभी न भाए बोली
एक-एक कर छोड़ चुके हैं, जितने थे हमजोली
धोबी वाला बना हुआ हूं, मिलती नहीं लुगाई
कपड़े से ज्यादा करते हैं मेरी लोग धुलाई
बिके पाक में नस्ल हमारी, चीन लुटाए पैसा
मगर यहां तो भाव हमारा, है जैसे का तैसा
एक तरफ वह छप्पन वाला, मेरी हॅंसी उड़ाए
मैं भी छप्पन वाला मम्मी, उसको कौन बताए
सूट-बूट दिलवा दो चाहे, जाकेट रंग-बिरंगा
पहन एक टी-शर्ट हमेशा, लगता हूं बेरंगा
देश-विदेश कहीं भी जाऊं, चींपो-चींपो गाऊं
संविधान की बात करूं, भारत की हॅंसी उड़ाऊं
गदहा हूं या घोड़ा हूं मैं, देख रहा है देश
पीछे सदा पड़ा रहता है, कविता लिए सुरेश
मम्मी बोली लल्ला तुझे झिंगोला कैसे लाऊं
रंग बसंती वाला या फिर हरा रंग सिलवाऊं
कभी कुली बन जाता है तू, बोझ किसी का ढोए
रिक्शा वाला कभी बने तू, गाकर ओए-ओए
कहता है कुछ सुबह, शाम को लल्ला कुछ कहता है
आता है जब भी चुनाव, तू सिंगापुर रहता है
अब तू ही ये बता कौन सा तुझे झिगोला लाएं
बहुरुपिए सा जीवन तेरा, अब कैसे समझाएं
जिस दिन अपना धर्म समझकर स्थिर मन कुछ बोला
प्यारे पुत्तर उस दिन दिलवा दूंगी तुझे झिगोला
जैसे बोल रहा है हर दिन, मन में रही न शंका
प्यारे पुत्तर रख लो लिखकर, लग जाएगी लंका
— सुरेश मिश्र
