शिकायत तू न करना
ज़माने से शिकायत तू न करना।
किसी से यूं अदावत तू न करना।।
अगर है ये ज़माना तेरा दुश्मन।
कभी कोई मुरौवत तू न करना।।
झुका दे सिर तेरे दर पे अगर वो।
कोई बेजा शरारत तू न करना।।
मुहब्बत हो अगर तो थाम लेना।
भरी महफ़िल अदालत तू न करना
हो कैसा भी तेरा हमदम ही है वो।
कहीं उसकी ज़लालत तू न करना।।
किया उसने अगर शिकवा किसी से।
कभी फिर उसकी इज्जत तू न करना।।
इजाज़त ले के करना माफ़ उसको।
कभी ‘प्रीती’ ख़िलाफ़त तू न करना।।
— प्रीती श्रीवास्तव
