कविता

इंसानियत का मर्म

बाकी सब कुछ भूलकर,
जिसने किया जाति धर्म।
वो अहमक क्या जाने,
इंसानियत का मर्म।

ऊंच-नीच की दीवारों में,
जिसने खुद को कैद किया।
नफरत की अंधी गलियों में,
अपना ही सब कुछ खो दिया।

खून का रंग तो एक ही है,
फिर कैसी ये दीवारें हैं।
मजहब के नाम पर लड़ते जो,
वो सोच से हारे हैं।

मंदिर, मस्जिद और गुरुद्वारे,
सब एक ही सीख सिखाते हैं।
पर अज्ञानता के अंधे राही,
आपस में ही लड़ जाते हैं।

सच्चा मजहब तो वो है,
जो रोते को हंसा सके।
गिरते हुए किसी इंसान को,
थाम के गले लगा सके।

छोड़ो ये मजहब की जंग,
आओ हम इंसान बन जाएं।
प्यार और भाईचारे से,
इस दुनिया को स्वर्ग बनाएं।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554

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