कविता

कुछ विक्षिप्त

हाँ, लिखने की कोशिश कुछ विक्षिप्त,
और मानने लगते स्वयं को दैदीप्य।
उगलते भीतर का तीखा ज़हर,
जिस पर अमल ला सकता कहर।

अपनी झुंझलाहट थोपना चाहते हैं,
नफ़रत के बीज वे रोपना चाहते हैं।
यह किसी से भी हो सकता है,
किसी स्त्री से भी हो सकता है।

पर तब उन्हें केवल स्त्री-दोष दिखते हैं,
उसकी तकलीफ़, दुख और पीड़ा
वे कभी समझ नहीं पाते हैं।
क्या पागल को कभी
अपने विचार बदलते देखा है?

उनकी आँखों में बस
मन के तैरते दृश्य ही दिखते हैं,
अपनी पीड़ा पर रह-रह कर
वे फिर छटपटाते हैं।
सच्चाई से उन्हें कोई सरोकार नहीं,
बड़बड़ाना ही जिनका व्यवहार सही।

औरतों से घृणा में वे भूल जाते हैं
कि उनके घर में भी
माँ और बहन स्त्री के ही रूप में आती हैं।

और सबसे खतरनाक होता है वह विक्षिप्त
जो पढ़ा-लिखा हो,
कुछ-कुछ लेखक या कवि भी हो सकता है;
जो पुरुषों के कृत्य और कुकर्म भुलाकर
पुरुष-प्रथम का झंडा उठाता है,
और स्त्री को स्वयं से तुच्छ बताता है।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554