कविता
मैं कुछ भी नहीं भूलती
अच्छा हो या बुरा
शायद यही जिम्मदारी है
या स्वभाव है मेरा
तुम कहते हो
जीने के लिए पैसा जरूरी है
मैं कहती हूँ
खुश रहने के लिए प्रेम जरूरी है
पैसा कम हो तो
तो जिंदगी कट जाती है
प्रेम न हो तो
नर्क से भी बदतर हो जाती है
शौहरत प्रसिद्धि सब व्यर्थ है
जब प्रेम का न कोई अर्थ है
उजालों में दीप जलाना
शायद अंधेरों की मजबूरी है
— वर्षा वार्ष्णेय
