पर्यावरण

वन्यजीव नहीं, उजड़ते जंगल गांवों के दरवाज़े पर हैं

जंगलों से उठती आह अब गांवों की दहलीज तक सुनाई देने लगी है। आधी रात खेतों में उतरते हाथी, बस्तियों के आसपास मंडराते तेंदुए और घरों की चौखट तक पहुंचते बाघ केवल वन्यजीव नहीं, बल्कि उस अंधाधुंध विकास के मौन साक्ष्य हैं जिसने उनसे उनका आशियाना छीन लिया। विडंबना यह है कि जिस देश ने सदियों तक वृक्षों को देवता और वन्यजीवों को प्रकृति का परिवार माना, वहीं आज गांवों में जंगल का नाम भय का पर्याय बनता जा रहा है। यह संघर्ष किसी एक किसान और एक जानवर के बीच नहीं, बल्कि उस बिगड़े संतुलन की कहानी है जिसमें मनुष्य ने प्रकृति की सीमाएं लांघ दीं और अब प्रकृति उसी भाषा में जवाब दे रही है। सवाल यह नहीं कि वन्यजीव गांवों में क्यों आ रहे हैं, असली सवाल यह है कि उनके जंगल आखिर बचे कहां हैं?

आंकड़े बताते हैं कि यह संकट अब भयावह हकीकत बन चुका है। वर्ष 2019 से 2024 के बीच हाथियों के हमलों में 2700 से अधिक लोगों की जान गई, यानी हर साल करीब पांच सौ परिवार उजड़ रहे हैं। बाघों और तेंदुओं के हमले भी लगातार बढ़ रहे हैं। खेतों की तबाही ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है। महाराष्ट्र में वन्यजीवों से कृषि नुकसान प्रतिवर्ष दस हजार से चालीस हजार करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। कर्नाटक के कोडागु में आधे किसान हर साल करीब नब्बे हजार रुपये गंवा रहे हैं। तमिलनाडु के पश्चिमी घाट के कई क्षेत्रों में 90 प्रतिशत से अधिक किसान वन्यजीवों को सबसे बड़ी समस्या मानते हैं, क्योंकि उनकी आधे से अधिक फसल जंगल निगल जाता है। जलवायु परिवर्तन, सिकुड़ते जंगल और बेलगाम विकास ने ऐसी स्थिति बना दी है कि न जंगल सुरक्षित हैं, न गांव।

मध्यप्रदेश का बावनगजा भी इस बढ़ते संकट की आहट महसूस कर रहा है। दुनिया यहां 52 गज ऊंची जैन प्रतिमा देखने आती है, लेकिन स्थानीय लोग वन्यजीवों की बढ़ती आवाजाही का असर भी देख रहे हैं। भीषण गर्मी से जंगलों के जलस्रोत सूख गए, भोजन घटा और वन्यजीव गांवों की ओर उतर आए। दिन में श्रद्धालुओं की घंटियां गूंजती हैं, रात में जंगल की हलचल बढ़ जाती है। कई बार खेतों को नुकसान पहुंचता है और ग्रामीणों के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो जाती हैं। बावनगजा आज केवल तीर्थ नहीं, बल्कि उस राष्ट्रीय संकट का प्रतीक बन चुका है, जहां प्रकृति और विकास आमने-सामने खड़े हैं।

यह संकट अब खेतों से निकलकर पूरे ग्रामीण जीवन पर छा चुका है। बच्चे स्कूल जाते समय रास्ते बदलते हैं। महिलाएं जंगल की ओर कदम बढ़ाने से पहले कई बार सोचती हैं। बुजुर्ग रातभर घर और खेत की रखवाली करते हैं। भय अब दिनचर्या का हिस्सा बन गया है। उधर मुआवजे की जटिल प्रक्रिया पीड़ित परिवारों की पीड़ा और बढ़ा देती है। सरकारी फाइलें उस किसान का दर्द नहीं समझती, जिसकी फसल, मवेशी या अपना एक पल में छिन गया। नतीजा यह है कि जिस समाज ने कभी वन्यजीवों को पूजनीय माना था, वही आज उन्हें सबसे बड़ा दुश्मन मानने लगा है। सह-अस्तित्व की भारतीय परंपरा अब अविश्वास में बदलती जा रही है।

इस संकट का हल केवल बंदूक, पिंजरे या वन्यजीवों को खदेड़ने में नहीं है। रास्ता वहीं निकलेगा, जहां विज्ञान, संवेदना और प्रभावी नीति साथ चलें। जंगलों के प्राकृतिक कॉरिडोर सुरक्षित हों, सौर फेंसिंग और सुरक्षा खाइयां बनें, रियल-टाइम ट्रैकिंग प्रणाली विकसित हो तथा गांवों तक त्वरित चेतावनी पहुंचे। सबसे जरूरी है कि नुकसान का मुआवजा पारदर्शी और समयबद्ध मिले, ताकि किसान को न्याय के लिए दफ्तरों के चक्कर न लगाने पड़ें। यदि विकास परियोजनाओं पर हजारों करोड़ खर्च हो सकते हैं, तो जंगलों की सीमा पर देश की पहली चौकी बने लोगों की सुरक्षा और सम्मान भी उतनी ही प्राथमिकता का विषय होना चाहिए।

बावनगजा जैसे क्षेत्रों में स्थानीय समुदाय की भागीदारी के बिना कोई योजना सफल नहीं हो सकती। सामुदायिक गश्त, वन विभाग और ग्रामीणों के बीच सतत संवाद, वैज्ञानिक इको-टूरिज्म तथा हर्बल खेती, वन-उत्पाद आधारित उद्योग और पर्यटन से जुड़ी आजीविकाएं इस संकट को अवसर में बदल सकती हैं। जब गांव की आजीविका जंगल से जुड़ेगी, तब जंगल दुश्मन नहीं, सहयोगी बनेगा। बच्चों की शिक्षा में भी वन्यजीवों के साथ सह-अस्तित्व को केवल पाठ्यक्रम नहीं, बल्कि जीवन-दृष्टि बनाना होगा। आखिर संरक्षण कानूनों से नहीं, संस्कारों से मजबूत होता है।

सबसे बड़ा सवाल हमारी विकास नीति के सामने खड़ा है। क्या विकास का अर्थ केवल जंगल काटकर सड़कें बिछाना है? क्या प्रगति का पैमाना सिर्फ कंक्रीट का विस्तार है? यदि यही सोच रही, तो आने वाले वर्षों में गांवों और जंगलों का संघर्ष और भयावह होगा। प्रकृति प्रतिशोध नहीं लेती, वह केवल अपना संतुलन वापस मांगती है। जब मनुष्य उसकी सीमाएं लांघता है, तब प्रकृति उसे उसकी अपनी सीमाओं का अहसास करा देती है। इसलिए विकास को प्रकृति-विरोधी नहीं, बल्कि प्रकृति-संगत बनाना अब विकल्प नहीं, राष्ट्रीय आवश्यकता है।

देश के वन-सीमांत गांव एक स्पष्ट संदेश दे रहे हैं। बावनगजा से लेकर कोडागु और पश्चिमी घाट तक एक ही पुकार है—जंगल बचेंगे तो गांव बचेंगे, गांव बचेंगे तो किसान बचेगा और किसान बचेगा तो भारत बचेगा। मनुष्य और वन्यजीवों का यह संघर्ष किसी एक की जीत से नहीं थमेगा। इसका समाधान केवल संतुलन, सह-अस्तित्व और इस स्वीकार में है कि धरती पर जितना अधिकार मनुष्य का है, उतना ही जंगल के हर जीव का भी। इतिहास बताता है कि जिसने प्रकृति को चुनौती दी, अंततः वही पराजित हुआ। अब फैसला हमारे हाथ में है—चेतावनी को समझें या आने वाली पीढ़ियों के लिए केवल पछतावा छोड़ जाएं।

— प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

प्रो. आरके जैन 'अरिजीत'

बड़वानी (मप्र)

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