ग़ज़ल
मेरे बच्चो, किताबें पढ़ने की आदत बना लो
पड़ी है सुप्त जो संवेदना उसको जगा लो
अंधेरा दूर होगा ज़ेहन से अज्ञानता का
किताबें पढ़ विलक्षण ज्ञान की ज्योति जगा लो
बहुत जद्दोजहद ,रस्साकशी है ज़िंदगीभर
बड़ों से सीख ले कर ज़िंदगी आसां बना लो
अहिंसा के पुजारी, शांति के तुम दूत बनकर
महज इंसानियत को धर्म तुम अपना बना लो
क़लम के बन के रहना है सिपाही तुम को लेकिन
मुसीबत देश पर आए तो बन्दूकें उठा लो
तरक्की राष्ट्र की जो चाहते हो आज मिल कर
नियम कानून पर चलने की तुम सौगंध खालो
कभी भाषा, कभी मज़हब का ले कर नाम कोई
तुम्हें जो वर्गलाये दूरियाँ उस से बढ़ा लो
— अजय अज्ञात
