कविता

गहरी नींद

क्या तुमने देखा है कभी किसी तबके को
जबरदस्त गहरी नींद में,
जो जागने का नाम ही नहीं लेता,
अपनी दशा का संज्ञान नहीं लेता।

पड़े हैं इस उम्मीद में कि
सब कुछ ऊपरवाले की मर्जी है,
आँखें इस कदर बंद हैं कि
समझ नहीं पाते
कहाँ किसकी कैसी खुदगर्जी है।

अत्याचार न सहने वाले लोग हैं,
जब-तब दे देते हैं जवाब,
मगर हक़ मारे जाने की
सुन नहीं पाते आवाज़।

जिस अदृश्य के लिए लालायित थे,
उसे उनके सामने गढ़ दिया गया,
उसका भय उनके मस्तिष्क में
गहराई से जड़ दिया गया।

अब करें तो करें क्या?
लात, जूते, चप्पल खाकर भी
छोड़ आते हैं अपनी सारी हया,
और चल पड़ते हैं उसी राह पर
जहाँ खो जाती है आत्म-दया।

भूलकर सब पुरानी बातें,
छोड़कर पूजा, कीर्तन और अज़ान,
देख नहीं पाते कि मिले हैं अधिकार
जिन्हें देता है पवित्र संविधान।

आते गए, जगाते गए
न जाने कितने महापुरुष,
पर उनकी बातें अनसुनी कर
पड़े हैं अब भी बेसुध।

हाँ, यह तुम्हारे ऊपर है वंचितों—
लुढ़कते रहो बनकर पींड,
या फिर तय करो स्वयं
कब त्यागोगे यह गहरी नींद।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554

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