बेरंग
सुबह करीब आठ बजे नहाने के बाद बालों में कंघी करके चेहरे पर क्रीम पाउडर तथा माथे पर छोटी सी बिंदी लगाकर जैसे ही रश्मि अपनी माँग में सिंदूर भरने लगी उसके हाथ से सिंदूर की डिबिया छूट गयी और उसमें रखा हुआ सिंदूर जमीन पर बिखर गया। सिंदूर बिखरा देखकर रश्मि के मुंह से अचानक चीख निकल पड़ी मानो सिंदूर न होकर खून बिखर गया हो । यह खून ही तो है समीर हमारे अरमानों का। रश्मि की नज़र दीवार पर टंगी अपने दिवंगत पति समीर की तस्वीर पर पड़ी। दर्द पिघलकर आँखों से बहने लगे। रश्मि अपने पति से मूक संवाद कर रही है ।
तुम्हारी यादों को दिल में सम्हाले एक पल भी खुद से जुदा नहीं किया मैंने तुम्हें और आज……आज क्यों मेरा स्तृत्व मातृत्व पर भारी पड़ रहा है ……?
सच कहती हूँ समीर तुम्हारे जाने के बाद मुझे जीने की रंच मात्र
भी इच्छा नहीं थी, मैं भी चाहती थी तुम्हारे साथ जाना लेकिन तुमने सोसाइड नोट लिखकर वादा जो मुझसे ले लिया था कि तुम्हारे बच्चों को माँ – बाप दोनों का ही प्यार दूंगी. “वादा करवाना और करना कितना आसान होता है लेकिन निभाना कितना मुश्किल वो भी एक अकेली स्त्री के लिए ये जानते हो? ” “जानोगे भी कैसे तुम पुरुष जो ठहरे, तुम्हारे लिये तो वादा करना और तोड़ना एक खेल होता है जिसका हश्र ज्यादा से ज्यादा जीत की खुशी या हार का गम और हम स्त्रियों के लिए यह जीवन और मृत्यु की तरह होता है, जो कि वादा निभाने के लिए जीती हैं और यदि किसी भी वजह से टूट जाय तो वह जीते जी मर जाती हैं. तुम यकीन भी नहीं करोगे क्योंकि तुम पुरुष हो. तुम तब समझते न जब तुम्हारे पास औरतों की तरह दिल होता और औरतों की तरह दिल होता तो तुम यूँ अकेले जा ही नहीं सकते थे .मानती हूँ कि तुम गमन के केस में कानून के फंदे में बुरी तरह से फँस चुके थे लेकिन हम अच्छे से अच्छा वकील रखते और तुम्हें बचा लेते. . एक तुम ही तो अकेले नहीं थे न जिसे ग़बन के केस में फँसाया गया हो? ” तब तो बिहार में भ्रष्टाचार उन्मूलन अभियान चला हुआ था। आये दिन सरकारी कर्मचारियों व पदाधिकारियों को घूस लेते रंगे हाथ पकड़े जाने की ख़बरों से अख़बार भरे पड़े होते। भ्रष्ट अधिकारियों की खैर नहीं थी। फिर भी जिसको पैसों की भूख थी वो जोखिम उठा ही लेते थे। तुमने तो कुछ किया भी नहीं था। तुम्हें तो बुरी तरह से फँसाया गया था। तुम तो कायर भी नहीं थे जो जीवन के जंग को छोड़ बीच में ही भाग जाते. फिर कैसे हो गया यह सब? कहीं किसी तुमसे जबरदस्ती सोसाइड नोट लिखवाकर तुम्हारी हत्या तो नहीं कर दी थी। खैर इन बातों से अब क्या फायदा। तुम वापस तो आओगे नहीं।
जब मेरी तबियत बहुत खराब हो गई थी तब मैं कुछ भी नहीं कर पा रही थी और तुम्हें भी कार्यालय के काम से इधर-उधर भागना पड़ता था. ऐसे में दो छोटे – छोटे बच्चों (आरोही एक वर्ष और अवरोह दो वर्ष) को अकेले सम्हालना मेरे वश में नहीं था तो तुम्हारे कहने पर ही तो मैं मायके गई थी. और तुमने जैसे ही कहा कि ” चली आओ रश्मि तुम्हारे और बच्चों के बिना यह घर काट खाने को दौड़ रहा है तो मैं उसी क्षण तुम्हारे पास आने के लिये जैसे – तैसे बैग पैक करके, बच्चों को लेकर गाड़ी में बैठ गई. मेरा भाई रवि खुद गाड़ी ड्राइव करके ले आया था। शायद उसे सच पता था। तभी तो उसने मेरे कमरे में आकर कहा था –
“दी अपना जरूरी सामान फटाफट ले लो। हमें आरा के जल्दी निकलना होगा। “
मैंने उससे पूछा “क्या हुआ रवि, सब ठीक तो है ? … कहीं… “
तब रवि ने कहा था – ““कुछ मत पूछो जल्दी चलो दी । “
तब मैं जिस हालत में थी उसी हाल में चल दी थी।
काश…. काश कि तुम मेरा थोड़ी देर और इंतजार करते तो मैं तुम्हें कहीं नहीं जाने देती और न ही मेरी ये दुर्दशा होती.
जानते हो? उस दिन मैं जैसे ही राँची से आरा तुम्हारे आवास पर पहुंची तो घर के बाहर पुलिस की जीप और भीड़ देखकर मेरा दिल जोरों से धड़कने लगा था . तब मुझे लगा था कि शायद पुलिस तुम्हें अरेस्ट करने आई है इसीलिए मैं गाड़ी रोककर मोबाइल पर अपने वकील का नम्बर डाॅयल करते हुए धड़ाधड़ उतरी.
अभी मैं पूरा माजरा समझ भी नहीं पाई थी कि तभी मुझे प्रेस वालों ने घेर लिया और तीखे प्रश्नों की गोली मेरे दिल दिमाग पर दागने लगे…….
” आपके पति ने आत्महत्या क्यों की…..?”
” क्या..” मैं कुछ समझ ही नहीं पाई थी इसीलिए प्रत्युत्तर में मैं भी प्रश्न पूछ बैठी थी.
मुझे चक्कर आने लगा था और मैं बेहोश होकर जमीन पर गिरने ही वाली थी कि एक महिला पुलिस ने मुझे थाम लिया था.
शायद वह स्त्री थी इसीलिए स्त्री का दर्द समझ रही थी, इसलिए प्रेस वालों को प्रश्न पूछने से मना किया और मुझे और बच्चों को पकड़ कर घर के अंदर ले गई.
घर के अंदर का नजारा देखकर मैं बेहोश हो गई थी. जब होश आया तो मेरा चेहरा भीगा हुआ था, कानों में रोने चिल्लाने की आवाजें गूंज रहीं थीं. तुम्हारे परिवार के सभी सदस्य मुझे कातिल की तरह देख रहे थे. और मैं अबोध सी विस्मय से भरी निगाहों से सभी को देख रही थी. महिला पुलिस ने मुझे पानी का गिलास थमाते हुए कहा ” पहले पानी पी लीजिए कुछ फार्मेलिटी करनी है इसलिए सही-सही उत्तर दीजियेगा…
तब भी तुम्हारे परिवार की निगाहें मुझे बेध रही थीं और तुम्हारे बच्चों की मासूम निगाहें उस घाव पर मरहम लगा रहीं थीं. मैं पुलिस तथा पत्रकारों के प्रश्नों का उत्तर दे रही थी और लोगों की नज़रें मुझे अपराधिनी की तरह घूर रहीं थीं, सच उगलवाने के लिए घुमा – फिराकर सवाल दागे जा रहे थे लेकिन मैं बेबाकी और निर्भीकता के साथ सभी प्रश्नों का उत्तर देती रही थी क्योंकि मेरे पास तुम्हारे प्रेम और सत्य की शक्ति थी.
मेरा उत्तर सुनकर पुलिस और पत्रकार चले गये. पुलिस को मेरे खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला .
सच कहूँ तो मैं तुम्हारे परिवार वालों की घूरती हुई शक्की निगाहों से मैं डर तो गई ही थी कि कहीं…….. लेकिन शायद उन्हें भी मेरी दशा देखकर दया आ गई होगी या फिर उन्हें तुम्हारे बच्चों का खयाल आ गया होगा । तुम्हारे परिवार के सभी सदस्य चिल्ला – चिल्ला कर रो रहे थे। तुम्हारी माँ बार – बार मुर्छित हो रही थी इसलिए सभी उन्हीं में लगे हुए थे। मैं तो बुत बनी बस तुम्हें देख रही थी। उस समय मुझे लग रहा था कि तुम उठ बैठोगे। मैं बीच-बीच में अपनेआप को ही चिकोटी काट रही थी कि कहीं ये बुरा सपना तो नहीं… काश बुरा सपना ही हो, लेकिन विडम्बना यह थी कि वह स्वप्न नहीं क्रूर सत्य था। मैं तुम्हें छोड़ नहीं रही थी क्योंकि मुझे यह विश्वास था कि तुम मुझे छोड़कर कहीं जा ही नहीं सकते थे इसलिए लग रहा था कि तुम मेरी आवाज़ सुनकर उठ बैठोगे। बड़ी मुस्किल से मुझे तुमसे अलग किया गया। मैं रो रही थी, चिल्ला रही थी लेकिन तुमपर कोई असर नहीं था।
इससे पहले तुमने मुझे कभी रोने कहाँ दिया था । याद है जब मैं अपनी बिदाई के अवसर पर माँ से लिपट कर रो रही थी तो तुमने मेरी माँ को वचन देते हुए कहा था कि अपसे आपकी बेटी मेरी पत्नी हुईं और विश्वास कीजिए कि मैं अपने जीते जी इन्हें कभी रोने नहीं दूंगा। आप जब चाहिये अपनी बेटी को बुला सकती हैं और अपनी बेटी का घर अपना समझकर आ भी सकती हैं। सच में तुमने अपना किया हुआ वादा निभाया भी। कहाँ तुमने मुझे अपने जीते जी कभी रोने दिया था ।
मुझे तुम्हारे परिजनों के साथ तुम्हारे गाँव ( मूल निवास) लीलाधरपुर ले जाया जा रहा था। मैं कभी रोती, कभी चिल्लाती, कभी तड़पती जैसे कि मिर्गी का दौरा पड़ा हो। विस्मय और डर से बच्चे मुझसे चिपके हुए थे जो मुझे यह एहसास दिलवा रहे थे कि मेरा जीना जरूरी हो गया है। हम लीलाधरपुर पहुंच गये । वहाँ तुम्हारे अंतिम यात्रा में सम्मिलित होने के लिये पूरा गांव उमड़ आया था। सज – धज कर तैयार शैय्या तुम्हारी ही प्रतीक्षा कर रही थी।कांधा देने के लिए पूरा गांव कहार बना हुआ था। तुम थे ही ऐसे जो गैरों को भी अपना बना लेते थे। सभी की दुआएँ तुम्हारे साथ होती थीं। लेकिन किसी की दुआ तुम्हें बचा नहीं सकी।
मैं रो रही थी, चिल्ला रही थी, तुम्हें जाने नहीं दे रही थी लेकिन बहुत ही बेदर्दी से मुझे तुमसे अलग करके मुझे घर के अंदर ले जाया गया था। और फिर बरसने लगा था मुझपर क्रूर रीतियों कहर ।
नाउन मेरे दोनों हाथों को पकड़ कर मेरी चूड़ियाँ उतार रही थी और मैं उस समय को याद कर रही थी जब पहली बार इस घर में तुम्हारे साथ कोहबर में आई थी। तुम्हारी माँ ने मेरी माँग बहोरने के बाद मुहदिखाई में जो लाल लाह पर सोने तथा हीरे मोतियों से जड़ा हुआ कंगन दिया था उसे अपनी कलाइयों से मैंने कभी नहीं उतारा। अगर कभी मैं चार चूड़ियाँ ही डालकर रहती तो तुम्हारी माँ टोक दिया करतीं कि बहु – बेटियों की कलाइयाँ भरी हुई ही अच्छी लगती हैं और उस दिन वे भी चुप – चाप तमाशा देख रही थीं और उधर से नाऊ मेरा सिन्होरा जिसके सिंदूर से तुमने मेरी माँग भरी थी बाहर ले जा रहा था।
मुझे पता नहीं कहाँ से उस समय ताकत आ गयी थी और मैं नाउन से अपनी कलाइयाँ छुड़ाकर जोर से नाऊ के पीछे भाग कर उससे अपना सिंदूर से भरा हुआ सिन्होरा छीन लिया था। सभी मेरे पास आ रहे थे कुछ जबरदस्ती करते हुए और कुछ प्रेम से समझाते हुए लेकिन मैं किसी की भी नहीं सुनी। मैंने उन सभी से यही कहा कि यह मेरे पति द्वारा मुझे दिया गया उपहार है जिसे मैं अपने जीते जी अलग नहीं कर सकती। ये सिन्होरा मेरी अंतिम यात्रा के समय मेरे साथ जायेगा।
बताओ न क्या गलत कहा था मैंने?
कहीं सुना है तुमने कि किसी ने किसी को उपहार दिया हो फिर छीन लिया हो? फिर यह सिन्होरा क्यों पति के साथ जाता है। सही मायने में तो यह पत्नियों की अमानत हुई न तो उनके साथ जाना चाहिए?
यह सवाल मेरे मन में तब भी उठता था जब मैं पापा के जाने के बाद माँ की दुर्दशा देखी थी। इधर पापा की अर्थी उठी रही थी और उधर घर में माँ के सर पर कुर्रीतियों की आरी चल रही थी। जैसे ही एक विधवा स्त्री आकर माँ की कलाइयों को छूना चाही वैसे ही माँ ने उससे अपना हाथ छुड़ाकर अपनी दोनों हाथों की चूड़ियाँ यह कहते हुए खोलकर फेंक दीं कि जब वही नहीं रहे तो मैं इन चूड़ियों का क्या करूंगी। मैं तब भी चाह रही थी माँ को रोकना पर मेरी एक न चली थी।
माँ से एक – एक कर के जीवन के सभी रंग छीन लिये गये थे और पिता के तेरहवीं के दिन पहनाया गया था मेरे मामा की लाई हुई सफेद साड़ी और दोनो हाथों में सोने की एक – एक मोटी चूड़ियाँ।
ये रिवाज भी कितना खराब है न कि जिस मायके से हर तीज – त्योहार पर नानी और उसके बाद से मामी माँ के लिए रंगबिरंगी साड़ियाँ और चूड़ियाँ भेजा करती थीं उसी को बेरंग करने के लिए पहले मायके से ही आती है सफेद साड़ी । उफ्फ……..
यह सवाल मेरे हृदय में कांटे की तरफ़ चुभ रहे थे इसलिए मैंने तुम्हारे घर के उन सदस्यों से भी पूछा था जिसे सुनकर सभी निरूत्तर हो गये थे। शायद सभी यही समझ रहे थे कि मैं पागल हो गई हूँ लेकिन तुम्हारी बहन ने उस समय मेरा साथ दिया था।
मैंने न तो चूड़ियाँ उतारी, न ही सिंदूर लगाना छोड़ा क्योंकि तुम मुझसे कभी दूर हुए ही नहीं।
मैं हर सुबह – शाम सज – सँवर कर तुम्हारी तस्वीर के सामने बैठती, बतियाती खुद को बहलाती और तुम्हें विश्वास दिलाती कि तुम्हारी निशानी तुम्हारे बच्चों को मैं कोई भी कष्ट नहीं होने दूंगी और फिर तुमसे किया गया वादा निभाने के लिए मैं भरपूर यत्न करती।
मैं पढ़ी-लिखी थी इसीलिए अनुकम्पा के आधार पर मुझे तुम्हारे ही डिपार्टमेंट में नौकरी मिली और एक अफसर की बीवी बन गई किरानी।
दफ्तर में मेरे पहनने – ओढ़ने और साज – श्रृंगार को लेकर अन्य कर्मचारियों के बीच कानाफूसी होती थी जो घूमफिर कर मुझ तक भी पहुंच जाती थी। मेरे पास इसे नजरअंदाज करने के सिवा कोई और चारा नहीं था क्योंकि एक अकेली औरत किस – किस से उलझती।
वैसे दफ्तर में कुछ अच्छे सहकर्मी भी थे जो कि तुम्हारा अक्सर ही बखान किया करते थे और मेरी सहायता करने के लिए तत्पर रहते थे। एक सहकर्मी वैभव राणा का घर तो मेरे घर के बगल में ही था इसीलिए जब मैं दफ्तर के लिए निकलती और वह देख लेता तो मुझे लिफ्ट दे दिया करता था और मुझे भी काफी सहुलियत मिल जाती थी तो मैंने कभी उसे मना भी नहीं किया था।
उसके बाद से आॅफिस और घर में मेरे चाल -चलन को लेकर लोग कानाफूसी करने लगे। तब मैं मन ही मन यही सोचती थी कि जिन औरतों के पति होते हैं वे भी तो पुरुषों से मदद लेती हैं लेकिन उनके चाल-चलन को लेकर तो लोग हाय तौबा नहीं मचाते हैं और तुम्हारे जाते ही मुझपर बदचलनी का धब्बा……।शुरुआती दिनों में इन बातों को सोच – सोच कर मैं व्यथित होकर रो पड़ती थी लेकिन धीरे-धीरे आदत पड़ गयी मुझे और मैंने लोगों की बातों को नजरअंदाज करना सीख लिया बिल्कुल इसी गाने के तर्ज पर कि – “कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना………
सच में अगर हम लोगों का सुनने लगें तो जी ही नहीं पायेंगे। ईश्वर गवाह है कि मैंने कभी उसे एक सहकर्मी के अलावा कुछ और नहीं समझा। दफ्तर की आग कहीं उस सहकर्मी की गृहस्थी तक नहीं पहुंच जाये यह सोचकर मैंने उसके साथ आना-जाना बन्द कर दिया।
मुझे अब पता चल चुका था कि दुनिया लाख बदलने का दावा कर ले लेकिन औरतों के प्रति अपनी सोच को नहीं बदलता। तभी तो कोई भी पुरुष चाहे वह मेरे रिश्ते का हो या फिर पड़ोस या दफ्तर का मैं उनसे सावधानी के तहत दूरी बनाये रखी।
पर क्या करूँ बच्चों को तो मम्मी और पापा दोनों का ही प्यार चाहिये। मैं लाख कोशिश के बावजूद भी तुम्हारी कमी को पूरी नहीं कर पा रही थी। ऐसे में वैभव राणा जब बच्चों को प्यार करता, उन्हें घुमाने ले जाता, या फिर बच्चों के बीमार पड़ने पर उन्हें डाॅक्टर के पास ले जाता तो मैं उसे रोक नहीं पायी। यह तो सत्य है कि एक स्त्री के लिए अपनी संतान सबसे प्रिय होती है और जो बच्चों को प्रिय होता है वह अनायास ही प्रिय हो जाता है। ऐसे में वैभव राणा से मेरा जुड़ाव होना स्वाभाविक ही है।
मुझे बड़े – बुजुर्गों की वो सभी उपदेश की घुट्टी याद है जब मैं बचपन की ड्योढी लांघ कर किशोरी गलियारे में बढ़ने को हुई थी तो और – “देखो औरत और मर्द आग और फूस की तरह होते हैं, पास आयेंगे तो जलेंगे ही।”
तब इन बातों का मतलब भी मुझे नहीं समझ में आता था और मैं उनकी बातों को इस कान से सुनकर उस कान से निकाल देती थी।
पर, पर आज उन बातों का अर्थ स्पष्ट समझ में आ रहा है।
क्या करूँ तुम ही बोलो। सिर्फ बच्चों को ही नहीं मुझे भी तुम चाहिए। सिर्फ यादों में ही नहीं हकीकत में। मैं पत्थर की मूरत नहीं एक जीती – जागती इंसान हूँ।
जब मैं रोऊँ तो सर रखने के लिए पुरुष का कांधा चाहिए…. और.भी बहुत कुछ …… क्या कहूँ……. छोड़ो भी……
तुम नहीं समझोगे तो और कौन समझेगा? “
भले ही मैंने उपरी रंग नहीं उतारा लेकिन मेरा अन्तर्मन तो बेरंग ही है न?
— किरण सिंह
