बंजारों की लड़की
पहाड़ों की ओट से जब सूरज की पहली किरन निकलती, तो वादी-ए-चिनार सुर्ख़ सुनहरी रोशनी में नहा जाती। इसी वादी के दामन में एक छोटा सा पहाड़ी गाँव आबाद था, और इस गाँव के मज़ाफ़ात (बाहरी हिस्से) में बंजारों ने अपने डेरे डाल रखे थे। रेशमाँ भी उन्हीं बंजारों की एक अल्हड़, आज़ाद पंछी जैसी लड़की थी। उसकी आँखों में पहाड़ी झरनों की चमक और हँसी में वादियों की गूँज थी। वह जितनी मासूम थी, उतनी ही ख़ुद्दार भी।
लेकिन इस मासूमियत पर गाँव के ताकतवर, जालिम और मगरूर मुखिया के इकलौते बेटे जागीर की काली नज़र थी। जागीर न सिर्फ घमंडी था, बल्कि रेशमा की खूबसूरती को देखकर उसे पाने के लिए किसी भी हद तक जाने को आमादा था। वह जबरदस्ती रेशमा से शादी करना चाहता था।
रेशमाँ का काम रोज़ जंगल से सूखी लकड़ियाँ चुनना और पहाड़ी जड़ी-बूटियाँ इकट्ठी करना था। लेकिन अब उसका यह रास्ता महफूज़ नहीं रहा था। जागीर अक्सर अपने हथियाबंद गुंडों के साथ उसका रास्ता रोकता। कभी वह घोड़े पर सवार होकर रेशमा के करीब से इस तरह गुज़रता कि धूल का गुबार उड़ जाता, तो कभी उसके बंजारन वाले पहनावे और पाज़ेब की छनक पर फब्तियां कसता।
“ऐ बंजारन! ये पैरों की छनक संभाल कर रख, बहुत जल्द ये मेरे महल की दासी बनने वाली हैं,” जागीर अपनी मूंछों पर ताव देकर हंसता।
रेशमा को उसकी यह बदतमीजी और छेड़छाड़ सख्त नापसंद थी। वह अपनी खुद्दारी से उसे झिड़क देती, जिससे जागीर की सनक और बढ़ जाती। मुखिया ने बंजारों को अपनी ज़मीन पर डेरे डालने की इजाज़त भी इसी गुप्त शर्त पर दी थी कि जवान होने पर रेशमाँ उनके घर की बहू—या यूँ कहें कि जागीर की बंधक बनेगी। रेशमा के गरीब कबीले वाले मुखिया के डर से खून का घूंट पीकर रह जाते थे।
एक रोज़, जब रेशमाँ जागीर के खौफ़ से दूर एक गहरे, एकांत चश्मे (झरने) के पास बैठी अपनी चाँदी की पाज़ेब पानी से साफ़ कर रही थी, तो पानी में एक अक्स उभरा। उसने चौंककर ऊपर देखा। सामने एक ऊँची चट्टान पर एक कड़ियल जवान खड़ा था। वह संगलाख़ (पथरीली) चोटियों के बागी कबीले का लड़का, ज़मान था। ज़मान की आँखों में एक अजीब सा ठहराव और चेहरे पर पहाड़ों का जलाल था।
पहली नज़र का वह टकराव दोनों के दिलों में एक ऐसी आग लगा गया जो फिर कभी न बुझ सकी। फिर यह रोज़ का मामूल बन गया। कभी चिनार के साए तले, तो कभी बहते झरने के किनारे, दोनों चोरी-छिपे मिलने लगे। ज़मान रेशमाँ को अपनी बाँसुरी की धुन पर नचाता और रेशमाँ अपने कबीले के लोकगीत ज़मान के नाम करती।
एक दिन, जब ज़मान और रेशमा झरने के पास बैठे थे, जागीर अपने शिकारियों के साथ वहाँ आ धमका। रेशमा को किसी और के साथ देखकर जागीर के तन-बदन में आग लग गई। उसने अपनी बंदूक ज़मान पर तान दी, “एक मामूली कबीलाई की इतनी हिम्मत कि वह जागीर की अमानत पर आँख डाले?”
ज़मान ने बिना डरे अपनी कुल्हाड़ी कस ली। हवा में तनाव खिंच गया। लेकिन रेशमा ने बुद्धिमानी से काम लिया और ज़मान का हाथ पकड़कर वहाँ से हटा दिया, क्योंकि वह नहीं चाहती थी कि कबीलों में जंग छिड़े। जागीर ने पीछे से चिल्लाकर कहा, “रेशमा! तू सिर्फ मेरी है। अगले हफ्ते तेरी डोली मेरी हवेली न आई, तो तेरे बाप की लाश इस झरने में बहेगी।”
मोहब्बत के आस्मान पर जुदाई के बादल अब पूरी तरह मंडलाने लगे। जब रेशमाँ और ज़मान की मोहब्बत का क़िस्सा हवा के झोंकों की तरह फैलता हुआ दोनों के ख़ानदानों तक पहुँचा, तो जैसे एक भूचाल आ गया।
रेशमाँ के बाप ने ख़ौफ़ और ग़ुस्से से काँपते हुए अपनी बेटी से कहा, “रेशमाँ! तूने जागीर की दुश्मनी मोल लेकर हमें बर्बादी के दहाने पर ला खड़ा किया है! मुखिया हमें इस वादी से धक्के मारकर निकाल देगा। तेरी शादी जागीर से ही होगी, यही हमारा नसीब है।”
दूसरी तरफ़, ज़मान के कबीले के बूढ़े सरदार ने भी उसे सख़्त चेतावनी दी कि मुखिया की दुश्मनी पूरे ख़ानदान को ले डूबेगी। दोनों तरफ सख़्त पहरे बिठा दिए गए। मुखिया की हवेली दीयों की रोशनी से जगमगा उठी और जागीर अपनी जीत के जश्न में डूब गया।
शादी की रात आ पहुँची। कोहरे की घनी चादर में लिपटी पहाड़ी पगडंडी पर रेशमाँ की डोली धीरे-धीरे मुखिया की हवेली की तरफ़ बढ़ रही थी। मुखिया के कारिंदे और खुद जागीर नशे और ग़ुरूर में चूर, बंदूके लहराते और नाचते हुए आगे चल रहे थे। जागीर बार-बार डोली के पास आकर हंसता, “आखिरकार, तू मेरी कैद में आ ही गई रेशमा।”
डोली के अंदर बैठी रेशमाँ का दम घुट रहा था। अचानक उसके कानों में दूर एक ऊँची चट्टान से आती ज़मान की बाँसुरी की वह आख़िरी, दर्दनाक धुन गूँजने लगी। “नहीं… मैं उस जालिम की कैदी बनकर घुट-घुट कर नहीं मर सकती!” रेशमाँ के अंदर की आज़ाद बंजारन ने बग़ावत कर दी।
जैसे ही डोली एक घने जंगल और धुंध वाले मोड़ पर पहुँची, रेशमाँ ने एक लम्हे की भी देरी नहीं की। उसने अपने भारी जोड़े की परवाह किए बिना, डोली का पर्दा हटाया और चीते की सी चपलता के साथ बाहर छलांग लगा दी। बाराती और जागीर अपनी ही धुन में मगन थे, किसी को कानों-कान ख़बर न हुई।
रेशमाँ अपने भारी जोड़े को सँभाले, पाँव की पाज़ेबों को हाथों में दबाकर भागने लगी। उसके नाज़ुक पाँव ज़ख़्मी हो रहे थे, लहू के कतरे बर्फीले रास्ते पर सुर्ख़ फूलों की तरह बिखरे जा रहे थे। वह सीधे भागती हुई ऊँची चोटी पर ज़मान के सीने से जा लगी।
उधर, जब बारात मुखिया की हवेली पहुँची और जागीर ने खुद डोली का पर्दा उठाया, तो उसके पैरों तले से जमीन खिसक गई। डोली खाली थी! रेशमाँ का सुर्ख़ घूँघट सीट पर पड़ा था, जैसे वह जागीर की मर्दानगी का मज़ाक उड़ा रहा हो।
“एक मामूली बंजारन ने मुझे ठुकरा दिया!” जागीर ग़ुस्से से पागल हो गया। मुखिया दहाड़ा, “जाओ! उन दोनों को ढूँढो, और उनके कबीलों को ऐसी सज़ा दो कि यह पहाड़ भी काँप उठें!”
रात का अँधेरा गहरा होते ही मुखिया के बंदूकधारी कारिंदे और जागीर घोड़ों पर सवार होकर भेड़ियों की तरह वादी पर टूट पड़े। उन्होंने बंजारों के मासूम डेरों को आग लगा दी। रेशमाँ के बूढ़े बाप को जागीर ने खुद घोड़े से घसीटा और ज़मीन पर पटक दिया। “कहाँ है तेरी बेटी? बोल!”
यही नहीं, वे बंदूके तानते हुए ज़मान के पहाड़ी कबीले की तरफ़ बढ़े। कई बेगुनाह लोग इस वहशियाना हमले में लहूलुहान होकर गिर पड़े। पूरी वादी बारूद के धुएँ और मज़लूमों की चीख़ों से दहल उठी।
दूर ऊँची चोटी से यह मंज़र देखकर रेशमाँ घुटनों के बल बैठ गई, उसकी आँखों से आँसुओं का सैलाब बह निकला। लेकिन ज़मान ने अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं। उसकी आँखों में अब एक सुलगता हुआ लावा था।
“रेशमाँ! अब भागने का वक़्त ख़त्म हो चुका,” ज़मान की आवाज़ में पहाड़ों जैसा संकल्प था। “अगर आज हम छिप गए, तो अपनों का लहू हमें कभी माफ़ नहीं करेगा। मुखिया और जागीर ने ताक़त के नशे में हमारी मोहब्बत को ललकारा है, अब उन्हें अंजाम भुगतना होगा।”
उसी रात दोनों नीचे उतरे। ज़मान ने पहाड़ी कबीले के नौजवानों को और रेशमाँ ने बंजारों के बिखरे हुए लोगों को इकट्ठा किया। जो बंजारे अब तक डरते थे, रेशमाँ की बहादुरी देखकर उनकी सोई हुई ग़ैरत जाग उठी। पहाड़ी कबीले का साहस और बंजारों की गुरिल्ला युद्ध की महारत ने मिलकर एक संयुक्त सेना तैयार कर ली।
अगली रात, जब मुखिया और जागीर अपनी कथित जीत के जश्न में डूबे हुए थे, अचानक हवेली के चारों तरफ़ से बंजारों के डरावने युद्ध-नाद गूँज उठे। ज़मान और रेशमाँ के नेतृत्व में दोनों कबीलों ने एक साथ हवेली पर धावा बोल दिया।
चारों तरफ तीरों की बौछार होने लगी। हवेली के मुख्य आँगन में ज़मान का सामना सीधे जागीर से हुआ। जागीर ने अपनी तलवार लहराई, “आज तू मेरे हाथों नहीं बचेगा, चरवाहे!”
लेकिन इस बार ज़मान के साथ अपनों के खून का बदला और रेशमा के अपमान का प्रतिशोध था। ज़मान की फुर्ती के सामने जागीर के वार खाली गए। ज़मान ने एक ही ज़ोरदार पैंतरे से जागीर की कलाई मरोड़ी, तलवार दूर जा गिरी, और ज़मान ने उसे ज़मीन-बोस (चित) कर दिया। जागीर, जो अब तक निहत्थों पर जुल्म करता था, मौत को सामने देख डर के मारे काँपने लगा।
मुखिया ने जब अपने बेटे को हारा हुआ और हवेली को घिरते देखा, तो उसका सारा घमंड ढह गया। वह घुटनों के बल बैठकर रहम की भीख माँगने लगा।
ज़मान ने अपनी भारी कुल्हाड़ी मुखिया और जागीर की गर्दन के पास ले जाकर रोक दी और गर्जना की,
“मुखिया! जागीर! तुमने सोचा था कि तुम्हारी दौलत और बंदूकें किसी की आज़ादी और इज़्ज़त को ख़रीद लेंगी? ये पहाड़ गवाह हैं कि ज़ुल्म की उम्र हमेशा छोटी होती है!”
एक सच्चे नायक की तरह ज़मान ने उनकी जान तो बख़्श दी, लेकिन उन्हें हमेशा-हमेशा के लिए इस वादी से बेदख़ल कर दिया।
दोनों कबीलों ने मिलकर ज़मान के न्याय और साहस को खुले दिल से तस्लीम किया और उसे वादी का नया मुखिया चुन लिया।
अब वादी का मंज़र पूरी तरह बदल चुका था। बंजारों के डेरे अब किसी ख़ौफ़ के साए में नहीं, बल्कि आज़ादी के गीतों से गूँजते थे। वादी के उसी केंद्र में, जहाँ कभी ज़ुल्म के फ़ैसले होते थे, आज वहाँ ज़मान और रेशमाँ की शादी का ऐतिहासिक जश्न हो रहा था।
रेशमाँ ने वही सुर्ख़ शादी का जोड़ा पहन रखा था, लेकिन अब उसके चेहरे पर जागीर का डर नहीं था, बल्कि अपने जीवनसाथी ज़मान के साथ गरिमा से जीने का गर्व और एक हसीन मुस्कान थी। पहाड़ों की ठंडी हवाओं में अब ज़मान की बाँसुरी और रेशमाँ की पाज़ेब की छनक मिलकर वादी की मुकम्मल आज़ादी और अमर प्रेम का एक नया तराना गा रहे थे।
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़
