व्यंग्य – दानवीर पिछे नहीं हटेंगे
अरें सुनो भोंका राम जी सुबह सवेरे ये कैसी बातें कर रहे हो । किसी भक्त की अगर मनवांछित मनोकामना पूर्ण होती है या फिर बरसों पुरानी गुलामी की जंजीर तोड़ कर किसी मंदिर को बनाने के लिए जन-मन की इच्छा पूरी होती है तो वह भक्त आंखें नीचे कर भगवान के श्री चरणों तक अपनी प्रसाद पहुंचने के लिए सदैव सेवा में हाजिर रहता है और सेवादार के रूप में सेवक , पुजारी उस प्रसाद को भगवान के चरणों में रख भक्तों को भरपुर आशीर्वाद देकर प्रसाद अपने पास रख लेता है या वापस कर देता यह व्यवस्था मंदिर की व्यवस्था पर आधारित है । जो प्रसाद अपने पास रखता है तो सेवादार प्रसाद का कहीं किसी रूप में उपयोग में लेगा या फिर उसका उपभोग करेगा तो इसमें नाराज होने वाली बात कौन सी है ? सेवक पर किसी प्रकार का इल्जाम लगाने वाली गंदी मानसिकता से ग्रस्त राजनीति का परिचय देना आपका यह रिश्ता क्या कहलाता है ?
मेरे भाई भोंका राम तुम जबरजस्ती भोंक रहे , चिल्ला रहें हों मेरी बात समझने को तैयार नहीं हो । किसी भी मंदिर में सेवा पुजा करने वाले पुजारी का कर्तव्य है कि , उसके पास जो प्रसाद आई है उसे भगवान को समर्पित करके अपने पास में रख सेवादारों में अथवा भक्तों में बांट देगा इसमें नाराज होने वाली बात कहां से आईं है ? तुम यह मत भूलो कि , भगवान के प्रति आस्था और विश्वास के साथ उसकी प्राण प्रतिष्ठा का ध्यान रखकर कोई भक्त अपनी भावनाओं के अनुरूप दान , पुण्य , पुजा , पाठ करने आएं और वह अंशदान , नक़द या धातु स्वरूप मंदिर के खाते में जमा कर देगा या दान पात्र में चढ़ाएगा तों यह कोई नई बात नहीं है । भगवान के चरणों में चढ़ाया गया चढ़ावें से मंदिर के पुजारी, सेवक , सेवादार अपने परिवार का पालन-पोषण ही करेगा और अगर उसके ट्रस्टी है तो वह भी इसका लाभांश किसी न किसी रूप में लेंगे क्योंकि मंदिर के अलावा उनके पास कोई काम , धंधा या चारा भी नहीं है तो वह क्या करेगा ?
अरे दादा कभी किसी ने इस बारे में सोचा है ? देश में कई ऐसे मंदिर है जहां पुजारी , सेवक , सेवादार को भगवान की सेवा का सेवा शुल्क भी संतोष जनक नहीं मिलता है वह भक्त और दर्शनार्थीयों के भरोसे रहता है ? इनमें से कुछ मंदिर तो सरकार के अधिन है जबकि अन्य धर्म के धर्मगुरु , धर्माचार्य के धर्म स्थलो सरकार के अधिन नहीं है फिर भी सरकारी अनुदान राशि सबसे ज्यादा मिलती है तो ऐसे में मंदिर की सेवा करने वाले को कुछ नहीं मिलता है तो सोचो उनकी की क्या हालात होती हैं ?
पिछले दिनों एक मंदिर में कुछ सेवादारों , पुजारी ने दान में आए हुए दान से अपने लिए कुछ अंश ले लिया तो इतना हल्ला मचा दिया की जरूरत नहीं है , उन्होंने क्या बहुत बड़ा संगीन अपराध कर दिया जबकि , संगीन अपराध करने वाले कई अपराधी बेख़ौफ़ होंकर बाजार में खुले सांड की तरह घूम रहे हैं उनका कुछ नहीं हुआ ? कई बहन , बेटीयों को देह व्यापार में धकेला जा रहा है ? इस पर तुम्हारा मौन क्यो ? महंगाई , बेरोजगारी , भ्रष्टाचार , मुलभुत आवश्यकताओं पर तुम्हारा चुपचाप बैठना आखिर क्यों ? वा रे मेरे देश के जागरूको मंदिर का चंदा चोरने वाले ने ऐसा कौन सा अपराध कर दिया जिसकी सजा दिलवाने के लिए ऊपर से लेकर नीचे स्तर तक हल्ला मचा रहे हैं ? और उनके खिलाफ एकजुट हो गए ? उनकी वकालत करने के लिए कोई आगे नहीं आएंगे ? तमाम प्रकार से आव्हान किया जा रहा है । देश के किसी कोने में कोई बलात्कार हो जाए या अन्य कोई अप्रिय घटनाएं हो जाए तो उसकी आवाज़ उठाने के लिए इतना हल्ला नहीं मचाया जाता है क्यों ? कहीं किसी प्रकार से आव्हान नहीं किया जाता है ? यह खेल सिर्फ , सिर्फ मन्दिर को बदनाम करने के लिए खेला जा रहा है और अपने किसी निजी स्वार्थ को सिद्ध करने या विरोध करने वाले राजनेतिक दल की अपनी टी आर पी बढ़ाने के लिए किसी को निचे दिखाने के लिए पिछे नहीं हट रहे है ? अरे बाबूजी जिस मंदिर में चंदा चोरी हुआं , दान चोरी हो गया उन चोरों को सजा देने के लिए देश का कानून सक्षम हैं । तुम्हारा इस तरह से चिल्लाना कानून पर संदेह। करना , शक करने जैसा है ? अरे भाई साहब मोहब्बत के सिवाय और भी ग़म है ज़ीने के लिए ।
भोंका राम जी आज़ भी मैं यही कहूंगा कि , कुछ तथाकथित तत्व सेक्युलर वादी के साथ रहकर और कुछ अधर्मी आपस में मिलकर इस मामले में शामिल हों कर मंदिरों को बदनाम करने में अहम् भूमिका निभा रहे हैं । कोई कितना भी ज़ोर लगा ले किसी भी मंदिरों में दान देने वाले पिछे नहीं हटेंगे । कानून अपना काम करने की मज़बूत स्थिति में है । उसे कुछ कहने , दिखाने की आवश्यकता नहीं है । अरें काका जी ऊपर वाले के यहां देर है अंधेर नहीं चोरों को सजा अवश्य मिलेगी कुछ समझें या नहीं समझें या ओर समझाऊं ?
— प्रकाश हेमावत
